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वर्गीज़ कुरियन
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कृषि · गुजरात

किसानों को मालिक बनाना

वर्गीज़ कुरियन आणंद में रुकना नहीं चाहते थे। लेकिन उन्होंने पूरी ज़िंदगी वहीं बिताई, और एक ज़िले की दूध सहकारी संस्था को ऐसी राष्ट्रीय व्यवस्था में बदलने में मदद की जिसके मालिक दूध देने वाले किसान ख़ुद थे।

वर्गीज़ कुरियनVerghese Kurien
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डॉ. वर्गीज़ कुरियन। फ़ोटो: Swetapadma07, CC BY-SA 3.0, विकिमीडिया कॉमन्स

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जन्म
26 नवंबर 1921, कोझिकोड
निधन
9 सितंबर 2012
भूमिका
NDDB के संस्थापक अध्यक्ष (1965–1998)
सम्मान
पद्म श्री 1965, पद्म भूषण 1966, पद्म विभूषण 1999; विश्व खाद्य पुरस्कार 1989
1949आणंद पहुँचे
33साल NDDB अध्यक्ष, 1965–1998
1989विश्व खाद्य पुरस्कार

आणंद, जहाँ वे रुकना नहीं चाहते थे

सरकार और NDDB से जुड़ी जीवनी सामग्री के अनुसार कुरियन ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ी और मिशिगन में प्रशिक्षण लिया, जिसके बाद 1949 में सरकारी बॉन्ड के तहत उन्हें आणंद की क्रीमरी भेजा गया। शुरू में उनका वहाँ रुकने का कोई इरादा नहीं था। लेकिन पास की किसान सहकारी संस्था के काम और उसके नेता त्रिभुवनदास पटेल से जुड़ाव ने उनके करियर की दिशा बदल दी।

अमूल मॉडल के पीछे का प्रबंधन

खेड़ा ज़िला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ में उनका मुख्य योगदान उस मॉडल को मज़बूत करना था जिसमें कारोबार के मालिक किसान हों, और जिसके पीछे अच्छी प्रोसेसिंग, बिक्री और पेशेवर प्रबंधन हो। तकनीकी पक्ष पर एच. एम. दलाया की भैंस के दूध से पाउडर बनाने जैसी उपलब्धियों ने सहकारी संस्था को नए उत्पाद दिए। कुरियन ने इन सब हिस्सों को जोड़कर ऐसी संस्था बनाने का नेतृत्व किया जो बढ़ सके।

NDDB और ऑपरेशन फ्लड

1965 में वे राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) के संस्थापक अध्यक्ष बने। NDDB ने आणंद मॉडल को देशभर के दुग्ध क्षेत्रों तक ले जाने के लिए ऑपरेशन फ्लड तैयार किया। तीन स्तर का ढाँचा, यानी गाँव की सहकारी समिति से ज़िला संघ और ज़िला संघ से राज्य महासंघ, उत्पादकों को बाज़ार तक पहुँच, ख़रीद का नेटवर्क और मूल्य-शृंखला पर मालिकाना हक़ देने के लिए बना था।

श्वेत क्रांति का असर

ऑपरेशन फ्लड को दुनिया के सबसे बड़े डेयरी विकास कार्यक्रमों में गिना जाता है, और NDDB कुरियन को भारत की श्वेत क्रांति का शिल्पकार कहता है। लेकिन दूध उत्पादन के इस बदलाव में करोड़ों किसान, सहकारी संस्थाएँ, पशु-चिकित्सा सेवाएँ, दूध ठंडा करने और ढोने के नेटवर्क और सरकारी नीतियाँ शामिल थीं। इसे एक व्यक्ति की निजी उपलब्धि कहना ग़लत होगा।

संस्थाओं की विरासत

उन्हें कई सम्मान मिले, जिनमें पद्म श्री (1965), पद्म भूषण (1966), विश्व खाद्य पुरस्कार (1989) और पद्म विभूषण (1999) शामिल हैं। ग्रामीण प्रबंधन संस्थान आणंद (IRMA) जैसी संस्थाओं और पेशेवर सहकारी प्रबंधन की संस्कृति ने उनके असर को डेयरी से आगे पहुँचाया।

उनकी सबसे टिकाऊ सीख यह है कि ग्रामीण विकास दान से नहीं, तब टिकाऊ बनता है जब उत्पादक अपनी संस्थाओं के मालिक हों और वे संस्थाएँ पेशेवर ढंग से चलें। नेतृत्व का सबसे बड़ा रूप ऐसी व्यवस्था बनाना है जो आपके जाने के बाद भी चलती रहे।

स्रोत