नौकरी नहीं, खेत चुना
सुंदरम वर्मा राजस्थान के सीकर ज़िले के दाँता गाँव के एक किसान परिवार से हैं। लगभग 1972 में उन्होंने विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। उनके अपने बताए अनुसार और उस समय की ख़बरों के मुताबिक़, उनका चयन सरकारी विज्ञान शिक्षक के पद के लिए हुआ था, लेकिन उन्होंने नौकरी के बजाय खेती और खेत में प्रयोग चुने। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) भी पुष्टि करता है कि नौकरी का मौक़ा होने के बावजूद उन्होंने खेत पर शोध को चुना।
उनकी सही जन्मतिथि किसी पक्के स्रोत में दर्ज नहीं है। 2020 की सरकारी सामग्री में उनकी उम्र 68 वर्ष बताई गई थी।
1982: एक प्रशिक्षण जिसने दिशा बदल दी
1982 में राजस्थान कृषि विभाग ने उन्हें नई दिल्ली के पूसा (IARI) में युवा किसान प्रशिक्षण के लिए भेजा। वहाँ उन्होंने शुष्क खेती के सिद्धांत सीखे, ख़ासकर मिट्टी की नमी बचाने का विचार। लेकिन राजस्थान की बेहद कम बारिश में ये तरीक़े जस के तस काम नहीं करते थे, इसलिए उन्होंने इस विचार को पेड़ों पर आज़माना शुरू किया।
शुरुआती पौधारोपण ज़्यादा सफल नहीं रहे; बिना सिंचाई के कम पौधे बचे। फिर 1982 में कुछ पौधे देर से, मानसून के बाद लगे, और उन्होंने देखा कि उनमें से कुछ उम्मीद से बेहतर बचे रहे। इससे एक सवाल उठा: अगर ऊपरी मिट्टी से नमी उड़ना रोक दिया जाए, तो क्या जड़ें नीचे जमा मानसून के पानी तक पहुँच सकती हैं? इसका जवाब खोजने में उन्होंने बरसों तक सधे हुए प्रयोग किए।
‘एक लीटर’ विधि कैसे काम करती है
यह विधि मानसून की बारिश को मिट्टी के भीतर सहेजती है और नन्हे पेड़ को उसी के सहारे बढ़ने देती है। पहले खेत को समतल किया जाता है ताकि बारिश का पानी बहने के बजाय ज़मीन में समाए। बारिश के बाद गहरी जुताई होती है। इससे नमी पीने वाले खरपतवार हट जाते हैं, और ऊपरी मिट्टी की वे बारीक नलियाँ टूट जाती हैं जिनसे पानी सतह तक आकर भाप बन जाता है।
मानसून के आख़िर में मिट्टी फिर तैयार की जाती है और पौधा सामान्य से ज़्यादा गहराई में लगाया जाता है, ताकि उसकी जड़ें जल्दी नीचे की नम परत की ओर बढ़ें। रोपते समय उसे लगभग एक लीटर पानी दिया जाता है। उसके बाद नियमित सिंचाई नहीं होती: पेड़ नीचे जमा नमी और बाद की बारिश के सहारे जीता है।
क्या यह सच में काम करती है?
अलग-अलग स्रोत पौधों के बचने की दर लगभग 80% से लेकर क़रीब 100% तक बताते हैं। सबसे काम का प्रमाण 2022 का एक फ़ील्ड अध्ययन है, जिसमें सीकर की कई जगहों पर अरडू, शीशम, नीम, रोहिड़ा, सहजन, बेर और खेजड़ी लगाए गए। जिन प्लॉटों का अध्ययन हुआ, वहाँ शीशम, रोहिड़ा, बेर और खेजड़ी के सभी पौधे बचे। अरडू, नीम और सहजन के ज़्यादातर नतीजे 90% या उससे ऊपर रहे, हालाँकि कुछ जगहों पर कड़ी ठंड और हवा से कुछ पौधे मरे भी।
अध्ययन का निष्कर्ष था कि ये स्थानीय प्रजातियाँ ‘एक लीटर’ विधि से उगाई जा सकती हैं, साथ ही यह भी कहा गया कि बड़े पैमाने पर सुझाने से पहले हर इलाक़े में अलग से परखना ज़रूरी है। यानी सच यह है कि कई देसी प्रजातियाँ बहुत अच्छी तरह बचीं, और नतीजा प्रजाति, जगह और मौसम पर निर्भर करता है।
50,000 से ज़्यादा पेड़
DST और राजस्थान सरकार, दोनों दर्ज करते हैं कि उनकी विधि से शुष्क शेखावाटी इलाक़े में 50,000 से ज़्यादा पेड़ उगाए गए। इनमें खेजड़ी, नीम, रोहिड़ा, अरडू, बेर, बबूल और शीशम जैसी स्थानीय, काम की प्रजातियाँ हैं। एक पुराने केस-स्टडी में अगस्त 2007 तक ही 21,000 से ज़्यादा पौधारोपण दर्ज थे।
संसद की एक शोध पुस्तिका बताती है कि उन्होंने छह नर्सरियाँ बनाईं और लगभग 1.5 लाख पौधे दूसरे किसानों को दिए, साथ में विधि का प्रशिक्षण भी। ये दो अलग पैमाने हैं, उगाए गए पेड़ और बाँटे गए पौधे, और इन्हें जोड़ना नहीं चाहिए।
फ़सलें सुधारने वाला किसान
पेड़ उनकी कहानी का सिर्फ़ एक हिस्सा हैं। DST के अनुसार उनकी सुधारी हुई काबुली चने की किस्म SR-1 पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण में दर्ज हुई। इसके दाने मध्यम-मोटे, वज़न ज़्यादा, पैदावार ज़्यादा और कीटों से लड़ने की ताक़त बेहतर बताई गई है।
उन्होंने शुष्क और अर्ध-शुष्क इलाक़ों के लिए उपयुक्त ग्वार SR-23 और लगभग 60–65 दिन में पकने वाली मोठ SR-1 पर भी काम किया, जिसकी पैदावार और रोग-कीट प्रतिरोध बेहतर है। उन्होंने कई देसी किस्मों को भी बचाकर रखा। उनके लिए लक्ष्य सिर्फ़ ज़्यादा उत्पादन नहीं था; फ़सलों की विविधता बचाना उनके काम का केंद्र रहा।
“जैव विविधता प्रकृति की आत्मा एवं हमारा भविष्य है।”
सुंदरम वर्मा
दूसरे नवप्रवर्तकों को खोजने वाले
1995 के आसपास जयपुर की एक कृषि कार्यशाला में उनकी मुलाक़ात प्रो. अनिल के. गुप्ता से हुई और वे हनी बी नेटवर्क से जुड़े। इसके बाद उन्होंने सिर्फ़ अपना विचार नहीं फैलाया, बल्कि दूसरे ज़मीनी आविष्कारकों को भी खोजा। वे राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान के शुरुआती सहयोगियों में रहे और उसकी जनरल बॉडी के सदस्य बने।
DST उन नवप्रवर्तकों के नाम दर्ज करता है जिन्हें खोजने में उन्होंने राजस्थान में मदद की, जैसे जगदीश पारिख, संतोष पचार, मदनलाल कुमावत, सुभाष ओला, यूसुफ़ ख़ान और राय सिंह दहिया। इनमें से कई को बाद में राष्ट्रीय ज़मीनी नवाचार पुरस्कार मिले। GIAN के एक पुराने केस-स्टडी के अनुसार उन्होंने राजस्थान के लगभग 1,500 लोगों से नवाचार और पारंपरिक ज्ञान के 10,000 से ज़्यादा उदाहरण जुटाए।
राह में मिले सम्मान
पद्म श्री से बहुत पहले ही उनके काम को सम्मान मिलने लगा था: 1997 में ICAR का जगजीवन राम किसान पुरस्कार, 1998 में राजस्थान सरकार का वन पंडित पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ किसान राज्य पुरस्कार, 2003 में चौधरी चरण सिंह कृषक शिरोमणि राष्ट्रीय पुरस्कार, और 2007 में जैव विविधता संरक्षण के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार।
2020 में समाज सेवा श्रेणी में उनके पद्म श्री की घोषणा हुई। 9 नवंबर 2021 को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया।
आज भी जड़ें जमा रही है विधि
यह विधि आज भी इस्तेमाल हो रही है। मार्च 2025 की NDTV राजस्थान की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार झुंझुनूं ज़िले के देवरोड़ में मुक्ति धाम पर उनके मार्गदर्शन में लगभग 7,500 पौधे लगाए गए। क़रीब डेढ़ साल बाद इनमें से कई पौधे लगभग दस फ़ुट तक पहुँच चुके थे।
देखें
स्रोत
- DST / PIB: 'Journey of an innovator to an innovation influencer'
- Gazette of India: Padma Awards 2020
- Parliament PRIDE research booklet
- Rajasthan government innovation record
- ICFRE SLEM practitioners database
- ICAR-CAFRI Agroforestry Success Stories
- GIAN / Honey Bee Network case study
- Field evaluation study, Sikar (2022)
- NDTV Rajasthan ground report, March 2025
- dst.gov.in/journey-innovator-innovation-influencer