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सुब्रह्मण्यन चंद्रशेखर
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विज्ञान और नवाचार · तमिलनाडु

मरते तारे की सीमा

इंग्लैंड जाते जहाज़ पर मद्रास के एक 19 साल के युवक ने गणना की कि कुछ मरते तारों का ढहना तय है। एक प्रसिद्ध खगोलविद ने इस विचार का मज़ाक उड़ाया। आधी सदी बाद इसी पर नोबेल पुरस्कार मिला।

सुब्रह्मण्यन चंद्रशेखरSubrahmanyan Chandrasekhar
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सुब्रह्मण्यन चंद्रशेखर। फ़ोटो: अभिलेखीय चित्र; श्रेय की पुष्टि जारी

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जन्म
19 अक्टूबर 1910, लाहौर
निधन
1995
क्षेत्र
खगोल भौतिकी, तारों की संरचना
संस्थान
प्रेसीडेंसी कॉलेज, मद्रास; शिकागो विश्वविद्यालय
सम्मान
भौतिकी का नोबेल पुरस्कार 1983; रॉयल मेडल; कॉप्ली मेडल
~1.4सौर द्रव्यमान: चंद्रशेखर सीमा
1983भौतिकी का नोबेल पुरस्कार

समुद्र पर एक गणना

सुब्रह्मण्यन चंद्रशेखर का जन्म 19 अक्टूबर 1910 को लाहौर में हुआ। वे सी. वी. रमन के भतीजे थे, लेकिन उनकी अपनी वैज्ञानिक पहचान पूरी तरह स्वतंत्र और गहरी थी। प्रेसीडेंसी कॉलेज, मद्रास से पढ़ाई के बाद वे कैम्ब्रिज गए।

समुद्री यात्रा के दौरान ही उन्होंने सापेक्षिकता के प्रभावों को क्वांटम सांख्यिकी के साथ जोड़कर श्वेत वामन तारों की द्रव्यमान-सीमा की गणना शुरू की।

लगभग 1.4 सूर्य

उन्होंने दिखाया कि कोई श्वेत वामन लगभग 1.4 सौर द्रव्यमान से ऊपर स्थिर नहीं रह सकता। यही चंद्रशेखर सीमा कहलाई: तारों के अंत को समझने की कुंजी, और श्वेत वामन, न्यूट्रॉन तारों और ब्लैक होल बनने के सिद्धांत की शुरुआत।

शुरुआती दौर में आर्थर एडिंगटन ने उनके निष्कर्षों का सार्वजनिक विरोध किया, जो युवा चंद्रशेखर के लिए गहरा पेशेवर झटका था। बाद में तारों के विकास की समझ ने उन्हें सही साबित किया।

दशकों का गहरा काम

उन्होंने शोध नहीं छोड़ा। शिकागो विश्वविद्यालय में उन्होंने तारकीय गतिकी, विकिरण स्थानांतरण, द्रवगतिकीय स्थिरता और ब्लैक होल पर बुनियादी काम किया और महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं; उनकी पाठ्यपुस्तकें खगोल भौतिकविदों की पीढ़ियों के लिए मानक संदर्भ बनीं।

1983 में उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला। उनका करियर वैज्ञानिक जुझारूपन का क्लासिक उदाहरण है: विज्ञान में सच लोकप्रियता से तय नहीं होता।

स्रोत