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सोमन्ना
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समाज सेवा · कर्नाटक

बंधुआ मज़दूरी से वन-अधिकार तक

सोमन्ना ने अन्याय ख़ुद झेला: बचपन में वे बंधुआ मज़दूर थे। बड़े होकर उन्होंने चार दशक मैसूरु क्षेत्र के वनवासी समुदायों को संगठित करने में लगाए, ताकि उन्हें ज़मीन, दस्तावेज़ और क़ानून में लिखे अधिकार मिलें।

सोमन्नाSomanna
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सोमन्ना। फ़ोटो: पद्म पुरस्कार, भारत सरकार

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जन्म
1 जून 1957
क्षेत्र
मैसूरु, कर्नाटक
समुदाय
जेनु कुरुबा (विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह)
कार्यक्षेत्र
वन-अधिकार, पुनर्वास, नागरिक अधिकार
सम्मान
पद्म श्री 2024
3,418परिवारों का पुनर्वास (प्रशस्ति)
19हाडियों को सामुदायिक वन-अधिकार
1981BKS के साथ संगठन शुरू

बंधन में एक बचपन

सोमन्ना का जीवन उसी अन्याय से शुरू होता है जिसके ख़िलाफ़ उन्होंने बाद में काम किया। आधिकारिक पद्म प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 1 जून 1957 को हुआ और वे जेनु कुरुबा समुदाय से हैं, जिसे विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह (PVTG) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

पिता की मृत्यु के बाद उन्हें चौथी कक्षा के बाद स्कूल छोड़ना पड़ा। परिवार की ज़िम्मेदारी के कारण वे बंधुआ मज़दूरी में धकेले गए और लगभग 18 वर्ष की उम्र तक वहीं रहे। 1978 के बाद इससे निकलकर उन्होंने दलित आंदोलन और आदिवासी संगठन-निर्माण की राह पकड़ी।

जंगल को संगठित करना

1981 में उन्होंने बुडकट्टु कृषिकर संघ (BKS) के साथ एच.डी. कोटे, सरगूरु और मैसूरु क्षेत्र में आदिवासी समुदायों को संगठित करना शुरू किया। वे वन-अधिकार, विस्थापन, PESA और वन अधिकार अधिनियम जैसे मुद्दों पर आंदोलनों और क़ानूनी प्रक्रियाओं से जुड़े।

2009 के उच्च न्यायालय आदेश के संदर्भ में उनकी प्रशस्ति 3,418 परिवारों के पुनर्वास, 19 हाडियों (बस्तियों) को सामुदायिक वन-अधिकार और लगभग 300 परिवारों को व्यक्तिगत अधिकार मिलने का उल्लेख करती है।

दान नहीं, नागरिकता

उनका काम ज़मीन तक सीमित नहीं रहा। BKS के नेतृत्व में विस्थापित परिवारों को खेती की ज़मीन, घर, सड़क, पीने का पानी, स्कूल, पेंशन, राशन कार्ड और मतदाता पहचान-पत्र दिलाने पर भी काम हुआ।

सोमन्ना की कहानी दिखाती है कि समाज-सेवा कभी-कभी दान नहीं, बल्कि क़ानूनी नागरिकता और सामूहिक अधिकार हासिल कराने की लंबी प्रक्रिया होती है।

स्रोत