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पूर्णिमा महतो
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खेल · झारखंड

तीरंदाज़ों के पीछे की कोच

पूर्णिमा महतो ने एक ही राष्ट्रीय खेलों में छह स्वर्ण जीते। फिर उन्होंने उससे भी कठिन काम किया: पच्चीस साल दूसरे तीरंदाज़ों को उनके पदक जिताने में लगाए।

पूर्णिमा महतोPurnima Mahato
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पूर्णिमा महतो। फ़ोटो: Rajivranprasad, CC BY-SA 3.0, विकिमीडिया कॉमन्स

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जन्म
15 अगस्त 1976, जमशेदपुर
खेल
तीरंदाज़ी: खिलाड़ी और राष्ट्रीय कोच
प्रशिक्षण
टाटा आर्चरी अकादमी, 1987 से
सम्मान
द्रोणाचार्य पुरस्कार; पद्म श्री 2024
6स्वर्ण पदक, 1994 राष्ट्रीय खेल
2000कोचिंग की शुरुआत
2024पद्म श्री

जमशेदपुर की एक तीरंदाज़

पूर्णिमा महतो का तीरंदाज़ी सफ़र लगभग दस साल की उम्र में शुरू हुआ। आधिकारिक पद्म प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 15 अगस्त 1976 को जमशेदपुर में हुआ। 1987 में वे औपचारिक प्रशिक्षण के लिए टाटा आर्चरी अकादमी से जुड़ीं और धीरे-धीरे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबलों तक पहुँचीं।

1993 से 1998 के बीच उन्होंने एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल स्तर के आयोजनों और अंतरराष्ट्रीय विश्व कप में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 1994 के पुणे राष्ट्रीय खेलों में उन्होंने छह स्वर्ण पदक जीते और सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुनी गईं।

खिलाड़ी से कोच

उनकी बड़ी विरासत कोचिंग से बनी। 2000 से उन्होंने खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देना शुरू किया और लंबे समय तक भारत की महिला तीरंदाज़ी व्यवस्था का हिस्सा रहीं। आधिकारिक प्रशस्ति उनके प्रशिक्षण को डोला बनर्जी, दीपिका कुमारी, कोमालिका बारी, प्रणीता और भजन कौर जैसी तीरंदाज़ों से जोड़ती है।

खेल का छिपा ढाँचा

द्रोणाचार्य पुरस्कार और 2024 का पद्म श्री ख़ुद पदक जीतने से आगे बढ़कर पदक जीतने वाले खिलाड़ी तैयार करने के उनके सफ़र की पहचान हैं। खेल के इतिहास में कोच अक्सर खिलाड़ियों से कम दिखते हैं; उनकी कहानी उसी छिपे ढाँचे को सामने लाती है।

कोच की सफलता अक्सर किसी और के पदक में दिखती है।

स्रोत