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पारबती बरुआ
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समाज सेवा · असम

हाथियों के साथ चलने वाली

पारबती बरुआ ऐसी दुनिया में बड़ी हुईं जहाँ हाथी परिवार भी थे और काम भी। लंबे समय तक पुरुषों के लिए माने गए क्षेत्र में वे देश की सबसे अनुभवी हाथी-संचालकों में से एक बनीं।

पारबती बरुआParbati Baruah
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पारबती बरुआ। फ़ोटो: GNTTV के माध्यम से

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AI आवाज़ में सुनाई गई
जन्म
14 मार्च 1953 (आधिकारिक रिकॉर्ड)
निवास
गौरीपुर, असम
पहचान
भारत की पहली महिला महावत
सम्मान
UNEP ग्लोबल 500; असम गौरव 2023; पद्म श्री 2024
14वर्ष की उम्र में पहली बार जंगली हाथी के साथ काम
2024पद्म श्री

हाथियों के बीच बचपन

पारबती बरुआ का बचपन गौरीपुर की उस दुनिया में बीता जहाँ हाथी परिवार और काम, दोनों का हिस्सा थे। उन्होंने अपने पिता, जो हाथियों के विशेषज्ञ थे, और महावत परंपरा से हाथियों का व्यवहार समझना सीखा। सरकारी और मीडिया रिकॉर्ड उन्हें भारत की पहली महिला महावत के रूप में पहचानते हैं।

आधिकारिक जीवनी सामग्री के अनुसार उन्होंने किशोरावस्था में ही हाथियों को सँभालना शुरू कर दिया और 14 साल की उम्र में पहली बार किसी जंगली हाथी को साधने का अनुभव पाया।

मैदान में दशकों

1970 के दशक में मेला शिकार पद्धति से कई जंगली हाथियों के प्रबंधन और प्रशिक्षण से उनका नाम जुड़ा। समय के साथ वे असम और पश्चिम बंगाल के वन अधिकारियों को हाथियों को पकड़ने, प्रशिक्षित करने और उनके व्यवहार के बारे में सलाह देने लगीं।

उनके काम का दूसरा अहम पहलू इंसान-हाथी संघर्ष है, जो सिकुड़ते आवासों के कारण असम और पूर्वोत्तर में गंभीर समस्या है। उन्होंने बार-बार कहा है कि हाथियों के व्यवहार को सिर्फ़ ख़तरे के रूप में नहीं, उसके पर्यावरणीय संदर्भ में समझना होगा, और वे प्रशिक्षण में स्नेह, धैर्य और पशु-मनोविज्ञान पर ज़ोर देती हैं।

सम्मान

UNEP ग्लोबल 500 सम्मान, असम में हाथी-कल्याण की मानद भूमिकाएँ, असम गौरव और 2024 के पद्म श्री ने उनके लंबे अनुभव को मान्यता दी। लेकिन उनकी असली कहानी लैंगिक बाधा तोड़ने के साथ-साथ उस कठिन मैदानी ज्ञान की है जो किताबों से नहीं, दशकों तक हाथियों के साथ रहने से बनता है।

वन्यजीव संघर्ष का हल सिर्फ़ ताक़त से नहीं, पर्यावरण और व्यवहार की समझ से निकलता है।

स्रोत