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मंदा कृष्णा मादिगा
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राष्ट्र निर्माण · तेलंगाना

एक माँग के तीस साल

1994 में मंदा कृष्णा मडिगा ने एक नीतिगत सवाल पर आंदोलन शुरू किया। उस पर सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले तक पहुँचने में तीन दशक के प्रदर्शन, याचिकाएँ और संगठन का काम लगा।

मंदा कृष्णा मादिगाManda Krishna Madiga
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मंदा कृष्णा मडिगा। फ़ोटो: रेडिफ़ के माध्यम से

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जन्म
7 जुलाई 1965, न्यू शायमपेट, हनमकोंडा
राज्य
तेलंगाना
संगठन
मडिगा आरक्षण पोराटा समिति (MRPS), 1994
सम्मान
पद्म श्री 2025
1994MRPS की स्थापना
30वर्षों का अभियान
2024सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला

न्यायपूर्ण हिस्सेदारी का आंदोलन

मंदा कृष्णा मडिगा का परिचय सामाजिक न्याय और सार्वजनिक नीति से जुड़ा है, इसलिए इसे पक्षपाती भाषा के बजाय तथ्यों के आधार पर लिखना ज़रूरी है। उनकी आधिकारिक पद्म प्रशस्ति उन्हें तेलंगाना के सामाजिक कार्यकर्ता और सार्वजनिक मामलों से जुड़े व्यक्ति के रूप में दर्ज करती है।

1980 के दशक से वे जातिगत भेदभाव और सामुदायिक अधिकारों के मुद्दों पर सक्रिय रहे। 1994 में उन्होंने MRPS की स्थापना की, जिसकी केंद्रीय माँग उप-वर्गीकरण थी, ताकि अनुसूचित जातियों के भीतर के समुदायों में आरक्षण के लाभ ज़्यादा न्यायपूर्ण तरीक़े से बँटें।

आरक्षण से आगे

उनकी सक्रियता सिर्फ़ आरक्षण की बहस तक सीमित नहीं रही। आधिकारिक प्रशस्ति एक दिव्यांग अधिकार संगठन, और पेंशन, स्वास्थ्य सहायता व हाशिये के समुदायों से जुड़े दूसरे अभियानों का भी उल्लेख करती है।

2024 का फ़ैसला

अगस्त 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों को अनुसूचित जातियों के उप-वर्गीकरण की अनुमति दी। MRPS ने इसे अपने लंबे अभियान का अहम पड़ाव माना, जबकि अमल और कोटा के अनुपात पर बहस जारी है। 2025 का पद्म श्री सार्वजनिक मामलों में उनके लंबे काम की पहचान है।

नीतियों में बदलाव शायद ही कभी एक चुनावी चक्र में आता है। किसी माँग को दशकों तक लोकतांत्रिक, क़ानूनी और संगठनात्मक रास्तों से ज़िंदा रखना अपने आप में लगन का उदाहरण है।

स्रोत