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एम. एस. स्वामीनाथन
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विज्ञान और नवाचार · तमिलनाडु

एक अकाल से सदाबहार क्रांति तक

1943 के बंगाल अकाल ने एम. एस. स्वामीनाथन को चिकित्सा से दूर खींच लिया। अगले आठ दशक उन्होंने इस सवाल पर लगाए कि भारत पर्याप्त अन्न कैसे उगाए, और बाद में, यह भी कि ज़मीन को थकाए बिना ऐसा कैसे हो।

एम. एस. स्वामीनाथनM. S. Swaminathan
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नई दिल्ली में संबोधित करते प्रो. एम. एस. स्वामीनाथन। फ़ोटो: भारत सरकार, विकिमीडिया कॉमन्स

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जन्म
7 अगस्त 1925, कुंभकोणम
निधन
28 सितंबर 2023
क्षेत्र
आनुवंशिकी, पादप प्रजनन, खाद्य सुरक्षा, टिकाऊ खेती
सम्मान
विश्व खाद्य पुरस्कार 1987; भारत रत्न 2024 (मरणोपरांत)
1943बंगाल अकाल ने रास्ता बदला
1987पहले विश्व खाद्य पुरस्कार विजेता
2024मरणोपरांत भारत रत्न

वह अकाल जिसने रास्ता बदला

एम. एस. स्वामीनाथन रिसर्च फ़ाउंडेशन (MSSRF) के अनुसार उनका जन्म कुंभकोणम में हुआ। परिवार चाहता था कि वे चिकित्सा की पढ़ाई करें। लेकिन 1943 के बंगाल अकाल और युद्धकाल की अन्न-कमी ने उन्हें कृषि की ओर मोड़ दिया। प्राणीशास्त्र की डिग्री के बाद उन्होंने कोयंबटूर कृषि महाविद्यालय से कृषि पढ़ी और पादप आनुवंशिकी व पादप प्रजनन में आगे बढ़े।

गेहूँ और हरित क्रांति

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) में उन्होंने बौने गेहूँ की आनुवंशिकी और प्रजनन पर काम किया। नॉर्मन बोरलॉग के मैक्सिकन बौने गेहूँ को भारतीय परिस्थितियों में परखने और ढालने वाले बड़े वैज्ञानिक नेटवर्क में वे प्रमुख भारतीय वैज्ञानिकों में थे।

गेहूँ का उत्पादन तेज़ी से इसलिए बढ़ा क्योंकि कई चीज़ें एक साथ आईं: खेतों में प्रदर्शन, बीज का गुणन, नीतिगत समर्थन, खाद और सिंचाई, और सबसे बढ़कर वे किसान जिन्होंने नया बीज अपनाने का जोखिम उठाया।

संस्थाओं का निर्माण

वे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक बने और कृषि अनुसंधान व शिक्षा में कई अहम पदों पर रहे। बाद में वे अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (IRRI) के महानिदेशक बने, इस पद पर पहुँचने वाले पहले एशियाई। 1987 में वे विश्व खाद्य पुरस्कार पाने वाले पहले व्यक्ति बने और फिर एम. एस. स्वामीनाथन रिसर्च फ़ाउंडेशन की स्थापना की।

हरित क्रांति के बाद: सदाबहार क्रांति

ज़्यादा संसाधनों वाली खेती ने अन्न की कमी दूर करने में मदद की, लेकिन भूजल, मिट्टी, जैव-विविधता और रसायनों के इस्तेमाल को लेकर चिंताएँ भी उभरीं। अपने बाद के वर्षों में स्वामीनाथन ने ‘सदाबहार क्रांति’ का विचार आगे बढ़ाया: पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाए बिना उत्पादकता बढ़ाना। उनकी सोच का यह विकास उनकी कहानी का ज़रूरी हिस्सा है। उन्हें सिर्फ़ पैदावार बढ़ाने वाले वैज्ञानिक के रूप में देखना आधी कहानी छोड़ देना है।

भारत रत्न

28 सितंबर 2023 को उनका निधन हुआ। 2024 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न दिया गया। 30 मार्च 2024 को उनकी बेटी नित्या राव ने उनकी ओर से यह सम्मान ग्रहण किया।

उनका जीवन बताता है कि खाद्य सुरक्षा विज्ञान, नीति, बुनियादी ढाँचे और किसानों के साथ मिलकर काम करने से आती है, और अच्छा वैज्ञानिक नेतृत्व अपने ही नतीजों से सीखता रहता है।

स्रोत