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कालूराम बामनिया
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कला और संस्कृति · मध्य प्रदेश

कबीर के शब्द, मालवा की आवाज़

कालूराम बामनिया ने संगीत किसी संगीत विद्यालय में नहीं सीखा। उन्होंने यह नौ साल की उम्र में गाँव के सत्संगों में पिता और दादा के साथ मंजीरा बजाते हुए सीखा, और पूरी ज़िंदगी उन गीतों को ज़िंदा रखने में लगा दी।

कालूराम बामनियाKaluram Bamaniya
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प्रस्तुति देते कालूराम बामनिया। फ़ोटो: हिंदुस्तान टाइम्स

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AI आवाज़ में सुनाई गई
क्षेत्र
मालवा, मध्य प्रदेश
गायन
कबीर, मीराबाई, गोरखनाथ और बन्नानाथ के भजन
परंपरा
मालवी लोक, परिवार से सीखी
सम्मान
पद्म श्री 2024 (कला)
9वर्ष की उम्र में मंजीरा शुरू किया
13वर्ष की उम्र में राम निवास राव से सीखा
2024कला के लिए पद्म श्री

नौ साल की उम्र से मौखिक परंपरा

कालूराम बामनिया का संगीत किसी औपचारिक संगीत विद्यालय से नहीं, उनके परिवार की सत्संग परंपरा से निकला। कई सांस्कृतिक स्रोतों और 2025 के एक साक्षात्कार के अनुसार उन्होंने लगभग नौ साल की उम्र में अपने पिता, दादा और चाचा के साथ मंजीरा बजाना शुरू किया। तेरह साल की उम्र में वे राजस्थान गए और घुमंतू मिरासी गायक राम निवास राव से गीतों का बड़ा भंडार सीखा।

मौखिक परंपरा ऐसे ही बचती है: एक बच्चा मंजीरे पर ताल देता है, परिवार के साथ सत्संगों में जाता है, और दशकों बाद वही गीत राष्ट्रीय मंचों तक ले जाता है।

कबीर को गाना नहीं, जीना

उनके लिए कबीर गाना सिर्फ़ मंच का कार्यक्रम नहीं है। हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत में वे कबीर की वाणी को जीवन, मृत्यु, जाति और धर्म पर भीतर झाँकने का निमंत्रण बताते हैं। वे तंबूरा और खड़ताल जैसे पारंपरिक वाद्यों के साथ सादा रूप पसंद करते हैं, ताकि शब्द सबसे आगे रहें।

मालवा से देश-विदेश के मंचों तक

कालूराम और उनकी मंडली ने देश-विदेश में कबीर, मीराबाई और दूसरे भक्त कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत की हैं। जोधपुर RIFF और राजस्थान कबीर यात्रा जैसे मंचों ने इस जीवित परंपरा को दर्ज किया है। यह विरासत का अहम रूप है: ये गीत किताबों में नहीं, गाए जाने और आगे सौंपे जाने में ज़िंदा रहते हैं।

पद्म श्री और अगली पीढ़ी

2024 के पद्म श्री ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दी, लेकिन उनका काम इससे दशकों पहले से चल रहा था। उनका MyGov परिचय यह भी बताता है कि वे युवा गायकों को प्रोत्साहित करते और सिखाते हैं। उन्होंने इस सम्मान को अपने पिता और दादा की परंपरा से जोड़ा।

असली कहानी पुरस्कार नहीं है। असली कहानी उससे पहले के दशकों की साधना है, और वे गायक जो आगे इन गीतों को ले जाएँगे।

स्रोत