नौ साल की उम्र से मौखिक परंपरा
कालूराम बामनिया का संगीत किसी औपचारिक संगीत विद्यालय से नहीं, उनके परिवार की सत्संग परंपरा से निकला। कई सांस्कृतिक स्रोतों और 2025 के एक साक्षात्कार के अनुसार उन्होंने लगभग नौ साल की उम्र में अपने पिता, दादा और चाचा के साथ मंजीरा बजाना शुरू किया। तेरह साल की उम्र में वे राजस्थान गए और घुमंतू मिरासी गायक राम निवास राव से गीतों का बड़ा भंडार सीखा।
मौखिक परंपरा ऐसे ही बचती है: एक बच्चा मंजीरे पर ताल देता है, परिवार के साथ सत्संगों में जाता है, और दशकों बाद वही गीत राष्ट्रीय मंचों तक ले जाता है।
कबीर को गाना नहीं, जीना
उनके लिए कबीर गाना सिर्फ़ मंच का कार्यक्रम नहीं है। हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत में वे कबीर की वाणी को जीवन, मृत्यु, जाति और धर्म पर भीतर झाँकने का निमंत्रण बताते हैं। वे तंबूरा और खड़ताल जैसे पारंपरिक वाद्यों के साथ सादा रूप पसंद करते हैं, ताकि शब्द सबसे आगे रहें।
मालवा से देश-विदेश के मंचों तक
कालूराम और उनकी मंडली ने देश-विदेश में कबीर, मीराबाई और दूसरे भक्त कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत की हैं। जोधपुर RIFF और राजस्थान कबीर यात्रा जैसे मंचों ने इस जीवित परंपरा को दर्ज किया है। यह विरासत का अहम रूप है: ये गीत किताबों में नहीं, गाए जाने और आगे सौंपे जाने में ज़िंदा रहते हैं।
पद्म श्री और अगली पीढ़ी
2024 के पद्म श्री ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दी, लेकिन उनका काम इससे दशकों पहले से चल रहा था। उनका MyGov परिचय यह भी बताता है कि वे युवा गायकों को प्रोत्साहित करते और सिखाते हैं। उन्होंने इस सम्मान को अपने पिता और दादा की परंपरा से जोड़ा।
असली कहानी पुरस्कार नहीं है। असली कहानी उससे पहले के दशकों की साधना है, और वे गायक जो आगे इन गीतों को ले जाएँगे।
स्रोत
- PIB: पद्म पुरस्कार 2024
- MyGov इंडिया: परिचय वीडियो
- हिंदुस्तान टाइम्स: 'कबीर हमें भीतर देखने को कहते हैं' (साक्षात्कार)
- जोधपुर RIFF 2024: कार्यक्रम
- pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1999790&lang=2®=48
- hindustantimes.com/books/kaluram-bamaniya-kabir-invites-us-to-go-within-101748336694020.html
- jodhpurriff.org/wp-content/uploads/2024/09/240916-JODHPUR-RIFF-2024-Scheduled.pdf