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के. एस. राजन्ना
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समाज सेवा · कर्नाटक

सहानुभूति नहीं, रैंप

जब के. एस. राजन्ना कर्नाटक के दिव्यांगजन आयुक्त बने, तो वे मेज़ के पीछे नहीं बैठे रहे। वे दफ़्तरों और अस्पतालों में जाकर देखते कि कौन अंदर आ सकता है और कौन नहीं, और विभागों को इसे ठीक करने की समय-सीमा देते।

के. एस. राजन्नाK. S. Rajanna
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2024 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से पद्म श्री ग्रहण करते के. एस. राजन्ना। फ़ोटो: फ़्री प्रेस जर्नल के माध्यम से

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पहचान
दिव्यांग अधिकार और सुगम्यता
सरकारी पद
दिव्यांगजन आयुक्त, कर्नाटक (2013–15 का दौर)
शिक्षा
मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा (रिपोर्ट के अनुसार)
सम्मान
पद्म श्री 2024 (समाज सेवा)
30 दिनकी समय-सीमा, सरकारी दफ़्तरों में व्हीलचेयर रैंप के लिए
2024समाज सेवा के लिए पद्म श्री

दिव्यांगता को नीति के सवाल की तरह देखना

के. एस. राजन्ना की कहानी सिर्फ़ निजी हौसले की कहानी नहीं है। उनके सार्वजनिक जीवन का सबसे अहम हिस्सा दिव्यांग अधिकार और सुगम्यता है। 2013 से 2015 की रिपोर्टें उन्हें कर्नाटक का पहला दिव्यांग ‘दिव्यांगजन आयुक्त’ बताती हैं।

मेज़ की जगह निरीक्षण

आयुक्त बनने के कुछ ही समय बाद राजन्ना ने सरकारी दफ़्तरों और अस्पतालों में व्हीलचेयर रैंप और पहुँच पर काम शुरू कर दिया। बैंगलोर मिरर और डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्टें ठोस क़दम दर्ज करती हैं, जैसे बॉरिंग अस्पताल का निरीक्षण और विभागों को रैंप व रेलिंग लगाने की समय-सीमा। ये दिखाती हैं कि वे अधिकार लागू करवाने वाले अधिकारी थे, सिर्फ़ नाम के लिए नियुक्त व्यक्ति नहीं।

उन्होंने अपने जीवन के अनुभव को नीति लागू करवाने की ताक़त में बदल दिया।

शिकायतें और प्रतिनिधित्व

2014 में उन्होंने आयोग में एक दिव्यांग सहायक आयुक्त की नियुक्ति के लिए पहल की, ताकि शिकायत निवारण व्यवस्था में दिव्यांगता का ख़ुद अनुभव रखने वाले लोग शामिल हों। शिक्षा और नौकरी तक पहुँच, परिवहन, पार्किंग और सरकारी इमारतों तक पहुँच जैसे मुद्दे उनके काम में बार-बार आते हैं।

पद्म श्री, और इसे कहने का सही तरीक़ा

2024 में भारत सरकार ने उन्हें समाज सेवा के लिए पद्म श्री दिया। समारोह की तस्वीरें, जिनमें वे बिना किसी सहायक उपकरण के ख़ुद आगे बढ़ते दिखे, ख़ूब साझा हुईं। वह भावुक पल था, लेकिन उन्हें ‘अलौकिक’ कहानी में नहीं बदलना चाहिए। उनका असली योगदान अधिकारों, पहुँच और संस्थाओं के काम करने के तरीक़े में बदलाव है।

दिव्यांग अधिकार दया का मामला नहीं हैं। वे पहुँच और बराबर भागीदारी का मामला हैं, और रास्ते की रुकावटें हटाने का।

स्रोत