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होमी जे. भाभा
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विज्ञान और नवाचार · महाराष्ट्र

भारत के परमाणु शोध के वास्तुकार

द्वितीय विश्व युद्ध ने एक प्रतिभाशाली युवा भौतिकविद को भारत में रोक दिया। होमी भाभा ने तय किया कि अगर वे यूरोप की प्रयोगशालाओं में नहीं लौट सकते, तो उसी स्तर की प्रयोगशालाएँ यहीं बनाएँगे।

होमी जे. भाभाHomi J. Bhabha
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होमी जे. भाभा। फ़ोटो: अभिलेखीय चित्र; श्रेय की पुष्टि जारी

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AI आवाज़ में सुनाई गई
जन्म
30 अक्टूबर 1909, बंबई
निधन
1966
क्षेत्र
नाभिकीय भौतिकी, संस्था-निर्माण
संस्थान
TIFR; परमाणु ऊर्जा आयोग; परमाणु ऊर्जा विभाग
सम्मान
पद्म भूषण 1954; रॉयल सोसाइटी के फ़ेलो 1941
1945TIFR की स्थापना
1941रॉयल सोसाइटी के फ़ेलो
1954पद्म भूषण

एक भौतिकविद का बनना

होमी जहाँगीर भाभा का जन्म 30 अक्टूबर 1909 को बंबई के एक शिक्षित पारसी परिवार में हुआ। उन्हें कैम्ब्रिज इंजीनियरिंग पढ़ने भेजा गया, लेकिन उनकी रुचि सैद्धांतिक भौतिकी में थी।

कॉस्मिक किरणों और कण भौतिकी पर उनके शोध ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। भाभा प्रकीर्णन और कॉस्मिक-किरण कैस्केड सिद्धांत उच्च-ऊर्जा भौतिकी में उनके प्रसिद्ध योगदान हैं।

रुके, फिर बनाया

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वे भारत में रह गए और IISc बैंगलोर में सी. वी. रमन के साथ जुड़े। उन्होंने समझा कि स्वतंत्र भारत को सिर्फ़ अकेले वैज्ञानिक नहीं, विश्व-स्तरीय संस्थान चाहिए।

1945 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च की स्थापना हुई, और परमाणु ऊर्जा आयोग तथा परमाणु ऊर्जा विभाग के निर्माण में भाभा केंद्रीय भूमिका में रहे। उन्होंने परमाणु ऊर्जा को दीर्घकालिक राष्ट्रीय क्षमता के रूप में देखा।

संस्थानों की विरासत

उनके संस्था-निर्माण ने नाभिकीय विज्ञान, इलेक्ट्रॉनिक्स, गणित, कंप्यूटिंग और अंतरिक्ष युग की प्रतिभा को आधार दिया। ट्रॉम्बे का परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान बाद में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र कहलाया।

1966 में एयर इंडिया फ़्लाइट 101 दुर्घटना में उनका निधन हुआ। उनका जीवन बताता है कि महान विज्ञान सिर्फ़ खोजों से नहीं, संस्थानों से भी बनता है।

स्रोत