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हरिमन शर्मा
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कृषि · हिमाचल प्रदेश

वह किसान जिसने सेब की खेती का नक्शा बदल दिया

हिमाचल के एक गरम आँगन में फेंके गए बीजों से निकला एक पौधा HRMN-99 बना, ऐसा सेब जो अब ठंडी पहाड़ियों से बहुत दूर भी फल देता है।

हरिमन शर्माHariman Sharma
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HRMN-99 सेबों के साथ हरिमन शर्मा

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AI आवाज़ में सुनाई गई
जन्म
4 अप्रैल 1956
ज़िला
बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश
पहचान
HRMN-99 कम-ठंड वाला सेब
सम्मान
पद्म श्री 2025 (कृषि)
1999आँगन में पौधा दिखा
20,000+ट्रायल के लिए पौधे भेजे गए, 2014–19
2,000+किसानों के खेतों में ट्रायल
292025 तक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश

कठिन शुरुआत

हरिमन शर्मा का जन्म 4 अप्रैल 1956 को हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर ज़िले में हुआ। उनके अपने बताए अनुसार, जन्म के सिर्फ़ तीन दिन बाद उनकी माँ का निधन हो गया और पनियाला गाँव के रिडकू राम ने उन्हें पाला। सरकारी रिकॉर्ड भी पुष्टि करते हैं कि बचपन में ही वे अनाथ हो गए, एक रिश्तेदार ने उन्हें पाला और उन्होंने दसवीं तक पढ़ाई की।

वे कभी किसी कृषि विश्वविद्यालय या प्रयोगशाला में नहीं गए। उनके अपने शब्दों में, शुरुआती बरस मज़दूरी, पत्थर तोड़ने और सब्ज़ी उगाने में बीते, और बाद में उन्होंने आम का बाग़ लगाया। इसी ज़मीन से देश के सबसे चर्चित किसान-नवाचारों में से एक निकलने वाला था।

1998: आँगन में फेंके कुछ बीज

1998 में वे घुमारवीं से कुछ सेब ख़रीदकर घर लाए। खाने के बाद उनके बीज आँगन में फेंक दिए गए। अगले साल, 1999 में, उन्हें वहाँ सेब का एक नन्हा पौधा उगता दिखा।

पनियाला लगभग 1,800 फ़ुट की ऊँचाई पर बसा एक गरम इलाक़ा है। व्यावसायिक सेब को आम तौर पर लंबी ठंड चाहिए। इसलिए उन्होंने पौधे को उखाड़ने के बजाय बढ़ने दिया। 2001 में उस पर फल आए। अब सवाल यह नहीं था कि बीज कैसे उगा। सवाल यह था कि इतनी कम ऊँचाई और इतनी गर्मी में सेब के पेड़ पर फल कैसे लगे।

बरसों की धैर्य भरी मेहनत

उन्होंने मूल पेड़ को ‘मदर प्लांट’ की तरह सँभाला और ग्राफ़्टिंग शुरू की। सेब का रूटस्टॉक न मिलने पर उन्होंने पहले एक टहनी आलूबुख़ारे (प्लम) के पेड़ पर ग्राफ़्ट की। ग्राफ़्ट सफल रहा और बाद में अच्छे फल आए। 2004–05 के आसपास वे शिमला से क्रैब-एप्पल के पौधे लाए, उन पर ग्राफ़्टिंग की और लगभग 2005 तक एक छोटा सेब का बाग़ तैयार हो गया।

पेड़ उगाना आसान हिस्सा निकला। 2007 से 2012 तक वे किसानों, बाग़बानी विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों को समझाते रहे कि कम ठंड वाले इलाक़ों में भी सेब उग सकता है। बरसों तक ज़्यादा सुनवाई नहीं हुई।

विज्ञान ने परखा

2012–13 के आसपास राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान (NIF) ने उनके काम को आगे बढ़ाया। उसने आणविक और विविधता विश्लेषण, फलों की गुणवत्ता जाँच, आकृति-विज्ञान अध्ययन, SSR DNA फ़िंगरप्रिंटिंग और कई जगहों पर ट्रायल करवाए।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अनुसार इन अध्ययनों ने दिखाया कि HRMN-99, ‘अन्ना’ और ‘डॉर्सेट गोल्डन’ जैसी दूसरी कम-ठंड वाली किस्मों से अलग है। एक किसान की बात अब विज्ञान की कसौटी पर खरी उतर चुकी थी।

HRMN-99 क्या है?

सरकारी रिकॉर्ड HRMN-99 को स्व-परागण करने वाली, कम ठंड वाली सेब की किस्म बताते हैं। इसे ज़्यादातर व्यावसायिक सेबों की तरह लंबी ठंड नहीं चाहिए। ट्रायल में इसने मैदानी, उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय इलाक़ों में फल दिए हैं, उन जगहों पर भी जहाँ गर्मियों में तापमान 40–45°C तक पहुँचता है।

फल की पीली त्वचा पर लाल धारियाँ होती हैं और गूदा नरम, मीठा और रसीला होता है। 2021 के फ़ील्ड आँकड़ों में तीन से आठ साल पुराने पेड़ों से हर साल प्रति पेड़ 5 से 75 किलो फल दर्ज हुए।

एक आँगन से पूरे देश तक

2014 से 2019 के बीच NIF ने ट्रायल के लिए 20,000 से ज़्यादा पौधे 2,000 से अधिक किसानों के खेतों और 25 संस्थाओं तक पहुँचाए। 2021 तक यह किस्म 30 राज्यों में परखी जा चुकी थी और 23 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में इस पर फल आने की सूचना थी। राष्ट्रपति भवन भी ट्रायल की जगहों में शामिल था।

मणिपुर इसका अहम उदाहरण बना। 2015 में वहाँ आठ जगहों पर 26 किसानों ने इसे उगाना शुरू किया; बाद में लगभग 200 और किसान जुड़े और वहाँ 20,000 से ज़्यादा HRMN-99 पेड़ होने की सूचना मिली। 2025 तक सरकारी रिपोर्टों के अनुसार यह 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक पहुँच चुकी थी, और पूर्वोत्तर में एक लाख से ज़्यादा पौधे लगाए जा चुके थे।

दर्ज हुई किसान की किस्म

HRMN-99 सिर्फ़ एक नाम नहीं है। यह भारत के पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण ढाँचे के तहत Malus domestica HRMN 99 के नाम से, किसान हरिमन शर्मा के नाम पर, संदर्भ संख्या REG/2014/1282 के साथ दर्ज है। श्रीनगर का ICAR-केंद्रीय शीतोष्ण बाग़वानी संस्थान इसकी जाँच से जुड़ा रहा।

इसलिए वे सिर्फ़ ‘एप्पल मैन’ नहीं, बल्कि एक मान्यता प्राप्त किसान-किस्म के विकासकर्ता हैं।

धीरे-धीरे मिली पहचान

पौधा 1999 में दिखा था। राष्ट्रीय सम्मान 2025 में मिला। इस बीच पहचान धीरे-धीरे बढ़ी: 2016 में राष्ट्रीय नवोन्मेषी किसान पुरस्कार, 2017 में NIF के 9वें राष्ट्रीय द्विवार्षिक ज़मीनी नवाचार पुरस्कारों में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के हाथों राष्ट्रीय पुरस्कार, और 2020 में ICAR-जगजीवन राम अभिनव किसान पुरस्कार। 2023 में उन्होंने मलेशिया में चौथे आसियान-भारत ज़मीनी नवाचार मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व किया।

25 जनवरी 2025 को भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र में उन्हें पद्म श्री देने की घोषणा की। 28 अप्रैल 2025 को नागरिक अलंकरण समारोह में उन्हें यह सम्मान मिला।

यह कहानी क्यों मायने रखती है

इस कहानी का केंद्र पुरस्कार नहीं है। केंद्र यह है कि दसवीं पास एक किसान ने एक अनोखी चीज़ पर ग़ौर करके क्या कर दिखाया। उन्होंने उस पौधे को पहचाना जिसे ज़्यादातर लोग खरपतवार समझकर उखाड़ देते। बिना किसी सहारे के बरसों डटे रहे। ‘मेरी बात मानो’ कहने के बजाय वैज्ञानिकों को अपनी बात परखने दी। और नतीजे को हज़ारों किसानों तक पहुँचाने में हाथ बँटाया।

खेती के अच्छे विचार सिर्फ़ प्रयोगशालाओं से नहीं आते। कभी-कभी वे किसी आँगन से शुरू होते हैं।

देखें

स्रोत

  • President of India: Padma Shri citation
  • DST / PIB profile, 2021
  • DST / PIB, 2025
  • ICAR award citation, 2020
  • National Innovation Foundation: 9th Biennial profile and 2025 newsletter
  • ICAR-CITH, Srinagar
  • The Indian Express interview
  • Hariman Sharma Apple Nursery (his own website)
  • dst.gov.in/padma-shri-hariman-sharma-apple-man-india