बनाना नहीं, उगाना
हैली वार की कहानी कोई पुल ‘बनाने’ की नहीं, दशकों तक उसे उगाने की कहानी है। मेघालय के खासी लोग रबर अंजीर (फ़ाइकस इलास्टिका) की हवाई जड़ों को साधकर जीवित जड़ पुल, जिंगकिएंग ज्री, बनाते हैं। आधिकारिक पद्म प्रशस्ति के अनुसार हैली वार का जन्म 5 फ़रवरी 1957 को हुआ और वे लगभग दस साल की उम्र से इस देसी जीवित इंजीनियरिंग परंपरा से जुड़े हैं।
उमकार पुल
सोहरा के सिएज गाँव में उन्होंने नालों और नदी पार करने की जगहों पर हवाई जड़ों को सावधानी से साधा, आपस में गूँथा और पाला। उनका सबसे जाना-माना काम उमकार जीवित जड़ पुल है। कंक्रीट के पुल की तरह इसके पूरा होने का कोई एक दिन नहीं होता: जड़ों को मज़बूत होने, आपस में जुड़ने और भार उठाने लायक बनने में वर्षों, बल्कि दशकों लगते हैं। इसीलिए उनका काम धैर्य पर टिकी इंजीनियरिंग का दुर्लभ उदाहरण है।
पिता और दादा से मिला ज्ञान
सितंबर 2026 में PIB के एक प्रेस दौरे पर वार ने पत्रकारों को समझाया कि जड़ों को कई वर्षों तक कैसे साधा और पाला जाता है, और बताया कि यह उन्होंने अपने पिता और दादा से सीखा। यानी यह किसी एक व्यक्ति का आविष्कार कम, पीढ़ियों से चले आ रहे ज्ञान को सहेजना और आगे सौंपना ज़्यादा है। प्रशस्ति युवा परिवारों को सिखाने, पर्यावरण को मज़बूत बनाने और टिकाऊ पर्यटन में भी उनके योगदान को दर्ज करती है।
वे किसान भी हैं, सुपारी, पान, काली मिर्च और फल उगाते हैं, इसलिए प्रकृति की उनकी समझ ज़मीन पर रोज़ के जीवन का हिस्सा है। पद्म श्री ने उस व्यक्ति को राष्ट्रीय पहचान दी जो मेघालय के सबसे पसंदीदा नज़ारों में से एक के पीछे दशकों से लगभग अनदेखा काम करता रहा।
स्रोत
- PIB / पद्म पुरस्कार 2026: आधिकारिक प्रशस्ति
- PIB: पद्म पुरस्कार 2026
- PIB (सितंबर 2026): प्रेस दौरा रिपोर्ट
- गुवाहाटी प्लस: हैली वार को पद्म श्री
- static.pib.gov.in/WriteReadData/specificdocs/documents/2026/may/doc2026525876101.pdf
- pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2218580&lang=2®=3
- pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2312200&lang=2®=48
- guwahatiplus.com/hally-war-named-for-padma-shri-for-preserving-meghalayas-living-root-bridges