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फ़ारूक़ अहमद मीर
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कला और संस्कृति · जम्मू और कश्मीर

शॉल में लिपि

फ़ारूक़ अहमद मीर ने कभी कक्षा में पढ़ना नहीं सीखा। उन्होंने बुनना सीखा, और फिर दुनिया की सबसे बारीक शॉलों में से एक में तीन लिपियों के शब्द बुन दिए।

फ़ारूक़ अहमद मीरFarooq Ahmad Mir
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अपने करघे पर फ़ारूक़ अहमद मीर। फ़ोटो: कश्मीर ऑब्ज़र्वर के माध्यम से

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जन्म
9 अगस्त 1953, खैवान, श्रीनगर
कला
कानी और पश्मीना शॉल बुनाई
नवाचार
कानी बुनाई में हिंदी, उर्दू और संस्कृत सुलेख
सम्मान
राष्ट्रीय पुरस्कार 2007; संत कबीर पुरस्कार 2014; राज्य पुरस्कार 2019; पद्म श्री 2025
3लिपियाँ कानी बुनाई में
2007राष्ट्रीय पुरस्कार
2025पद्म श्री

एक बुनकर का सबसे बड़ा बेटा

फ़ारूक़ अहमद मीर कारीगरों की उस परंपरा से आते हैं जिसके लिए बुनाई रोज़ी भी है और पहचान भी। आधिकारिक पद्म प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 9 अगस्त 1953 को श्रीनगर के खैवान इलाक़े में हुआ। उनके पिता बुनकर थे, और सबसे बड़े बेटे होने के कारण वे स्कूल नहीं जा सके; कम उम्र से ही उन्हें परिवार के काम और भाई-बहनों की ज़िम्मेदारी में हाथ बँटाना पड़ा।

बुनाई में शब्द

उन्होंने कानी बुनाई की जटिल प्रक्रिया को आसान बनाने और डिज़ाइन की नई तकनीकें विकसित करने पर काम किया। उनका सबसे ख़ास नवाचार कानी बुनाई में हिंदी, उर्दू और संस्कृत की सुलेख कला लाना है। पारंपरिक शॉल को सिर्फ़ विरासत में मिले नमूनों तक सीमित रखने के बजाय उन्होंने लिपि और दृश्य डिज़ाइन के बीच एक नया मेल खोला।

अगली पीढ़ी

आधिकारिक रिकॉर्ड उनके काम को रोज़गार पैदा करने से भी जोड़ता है। कश्मीर ऑब्ज़र्वर की स्वतंत्र रिपोर्टिंग उन्हें लगभग छह दशक के शिल्प सफ़र वाला छठी पीढ़ी का कारीगर बताती है, और कहती है कि उन्होंने लगभग 350 कारीगरों को सीधे सिखाया है।

प्रशस्ति के अनुसार उनके बेटों ने उच्च शिक्षा हासिल की और ख़ुद पश्मीना बुनाई में पुरस्कार जीते। कोई शिल्प तभी बचता है जब अगली पीढ़ी उसे ग़रीबी का जाल नहीं, एक हुनरमंद, रचनात्मक पेशा माने।

स्रोत