एक बुनकर का सबसे बड़ा बेटा
फ़ारूक़ अहमद मीर कारीगरों की उस परंपरा से आते हैं जिसके लिए बुनाई रोज़ी भी है और पहचान भी। आधिकारिक पद्म प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 9 अगस्त 1953 को श्रीनगर के खैवान इलाक़े में हुआ। उनके पिता बुनकर थे, और सबसे बड़े बेटे होने के कारण वे स्कूल नहीं जा सके; कम उम्र से ही उन्हें परिवार के काम और भाई-बहनों की ज़िम्मेदारी में हाथ बँटाना पड़ा।
बुनाई में शब्द
उन्होंने कानी बुनाई की जटिल प्रक्रिया को आसान बनाने और डिज़ाइन की नई तकनीकें विकसित करने पर काम किया। उनका सबसे ख़ास नवाचार कानी बुनाई में हिंदी, उर्दू और संस्कृत की सुलेख कला लाना है। पारंपरिक शॉल को सिर्फ़ विरासत में मिले नमूनों तक सीमित रखने के बजाय उन्होंने लिपि और दृश्य डिज़ाइन के बीच एक नया मेल खोला।
अगली पीढ़ी
आधिकारिक रिकॉर्ड उनके काम को रोज़गार पैदा करने से भी जोड़ता है। कश्मीर ऑब्ज़र्वर की स्वतंत्र रिपोर्टिंग उन्हें लगभग छह दशक के शिल्प सफ़र वाला छठी पीढ़ी का कारीगर बताती है, और कहती है कि उन्होंने लगभग 350 कारीगरों को सीधे सिखाया है।
प्रशस्ति के अनुसार उनके बेटों ने उच्च शिक्षा हासिल की और ख़ुद पश्मीना बुनाई में पुरस्कार जीते। कोई शिल्प तभी बचता है जब अगली पीढ़ी उसे ग़रीबी का जाल नहीं, एक हुनरमंद, रचनात्मक पेशा माने।
स्रोत
- पद्म पुरस्कार 2025: आधिकारिक प्रशस्ति
- वस्त्र मंत्रालय: संत कबीर पुरस्कार विजेता
- कश्मीर ऑब्ज़र्वर: 'संरक्षण और लगन का सम्मान'
- MyGov इंडिया: पद्म परिचय
- padmaawards.gov.in/Document/pdf/CitationsForTickets/2025/202554.pdf
- handlooms.nic.in/assets/img/handloom%20awardee/Sant%20kabir%20Awardees.pdf
- kashmirobserver.net/2025/01/29/honouring-preservation-and-perseverance/