गाँव को चुनना
चैतराम देवचंद पवार की कहानी बारीपाड़ा जैसे आदिवासी गाँव को प्राकृतिक संसाधनों की देखभाल और सामुदायिक संस्थाओं के ज़रिए बदलने की है। आधिकारिक पद्म प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 1 जून 1967 को बारीपाड़ा में हुआ और उन्होंने 1993 में पुणे विश्वविद्यालय से M.Com किया। शहरी करियर के बजाय उन्होंने आदिवासी कल्याण और गाँव का विकास चुना।
बारिश को रोकना
इसके केंद्र में वाटरशेड का काम था: पत्थरों के छोटे बाँध, कंटूर खाइयाँ और जल संरक्षण। प्रशस्ति शुरुआत में 5,000 पेड़ लगाने और आगे 445 हेक्टेयर घने जंगल की बहाली दर्ज करती है। सुरक्षात्मक सिंचाई कम से कम 500 एकड़ तक और रबी सिंचाई लगभग 250 एकड़ तक पहुँची। सामुदायिक नियमों, वन संरक्षण और जल प्रबंधन ने खेती की पैदावार और गाँव की मज़बूती, दोनों बढ़ाईं।
पेड़ों से आगे
काम सिर्फ़ पर्यावरण तक नहीं रुका। कुपोषण, लड़कियों की पढ़ाई, स्वच्छता, साफ़ पीने का पानी, बेहतर चूल्हे, सोलर कुकर और फ़ैसलों में महिलाओं की भागीदारी पर भी काम हुआ। वे वन सलाहकार समिति में विशेषज्ञ सदस्य भी रहे।
बारीपाड़ा मॉडल इसलिए ख़ास है क्योंकि इसने संरक्षण को गाँव के अपने शासन से जोड़ा। पेड़ लगाना ज़रूरी था, लेकिन ऐसे नियम बनाना भी उतना ही ज़रूरी था जिन्हें सब मानें।
स्रोत
- पद्म पुरस्कार 2025: आधिकारिक प्रशस्ति
- कल्पवृक्ष: बारीपाड़ा गाँव अध्ययन
- विकिमीडिया कॉमन्स: पद्म श्री समारोह फ़ोटो
- static.pib.gov.in/WriteReadData/specificdocs/documents/2025/apr/doc2025428547201.pdf
- kalpavriksh.org/baripada-village/
- commons.wikimedia.org/wiki/File:The_President_of_India,_Smt_Droupadi_Murmu_presenting_the_Padma_Shri_Award_to_Shri_Chaitram_Deochand_Pawar_at_the_Civil_Investiture_Ceremony-I_at_Rashtrapati_Bhavan,_in_New_Delhi_on_April_28,_2025.jpg