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बीरबल साहनी
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विज्ञान और नवाचार · उत्तर प्रदेश

जीवाश्म पत्तियों में भारत का अतीत पढ़ने वाले

एक जीवाश्म पत्ती बता सकती है कि लाखों साल पहले जंगल कैसा था और जलवायु कैसी थी। बीरबल साहनी ने भारत में इन पत्थरों को पढ़ने को एक विज्ञान बनाया।

बीरबल साहनीBirbal Sahni
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बीरबल साहनी की प्रतिमा। फ़ोटो: अभिलेखीय चित्र; श्रेय की पुष्टि जारी

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जन्म
14 नवंबर 1891, भेरा (अब पाकिस्तान)
निधन
1949
क्षेत्र
पुरावनस्पति विज्ञान, भूविज्ञान
संस्थान
लखनऊ विश्वविद्यालय; बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ़ पैलियोसाइंसेज़
सम्मान
रॉयल सोसाइटी के फ़ेलो 1936
1936रॉयल सोसाइटी के फ़ेलो
1946संस्थान की नींव रखी

पत्थर में पौधे

बीरबल साहनी का जन्म 14 नवंबर 1891 को भेरा में हुआ, जो अब पाकिस्तान में है। कैम्ब्रिज में वनस्पति विज्ञान और पुरावनस्पति विज्ञान का प्रशिक्षण लेकर वे भारत लौटे।

उन्होंने प्राचीन पौधों के जीवाश्मों, गोंडवाना वनस्पतियों और पौधों के विकास पर शोध शुरू किया।

लखनऊ में एक नया विषय

लखनऊ विश्वविद्यालय में उन्होंने पुरावनस्पति विज्ञान को एक संगठित विषय बनाया। भारतीय जीवाश्म वनस्पतियों, ख़ासकर गोंडवाना पौधों, के उनके व्यवस्थित वर्गीकरण और विकास-अध्ययनों ने भूविज्ञान और वनस्पति विज्ञान के बीच पुल बनाया।

जीवाश्म पौधों के ज़रिए उन्होंने भारत के भूवैज्ञानिक इतिहास, प्राचीन जलवायु और पौधों के विकास को समझने में योगदान दिया।

गहरे अतीत के लिए एक संस्थान

उस समय भारत में यह क्षेत्र छोटा था। 1946 में उन्होंने पुरावनस्पति विज्ञान के समर्पित संस्थान की नींव रखी, जो 1949 में उनके निधन के बाद बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ़ पैलियोसाइंसेज़ के रूप में विकसित हुआ।

आज इसका काम प्राचीन जलवायु, जीवाश्म, भू-कालक्रम और पृथ्वी-तंत्र के इतिहास तक फैला है। अतीत को पढ़ना भविष्य को समझने में मदद करता है, और एक छोटा-सा क्षेत्र भी संस्था-निर्माण से राष्ट्रीय ताक़त बन सकता है।

स्रोत