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ए. पी. जे. अब्दुल कलाम
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विज्ञान और नवाचार · तमिलनाडु

वह प्रक्षेपण जो पहली बार नाकाम हुआ

'जनता के राष्ट्रपति' बनने से पहले ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने एक रॉकेट टीम का नेतृत्व किया, उसका पहला प्रक्षेपण विफल होते देखा, और नेतृत्व का वह सबक सीखा जिसे वे जीवन भर दोहराते रहे।

ए. पी. जे. अब्दुल कलामA. P. J. Abdul Kalam
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2008 में ए. पी. जे. अब्दुल कलाम। फ़ोटो: लिजेश के., CC BY-SA 3.0, विकिमीडिया कॉमन्स

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जन्म
15 अक्टूबर 1931, रामेश्वरम
निधन
27 जुलाई 2015
क्षेत्र
अंतरिक्ष, रक्षा तकनीक, विज्ञान नेतृत्व, शिक्षा
सम्मान
पद्म भूषण 1981, पद्म विभूषण 1990, भारत रत्न 1997
1980SLV-III ने रोहिणी उपग्रह को कक्षा में पहुँचाया
11वेंराष्ट्रपति, 2002–2007
3राष्ट्रीय सम्मान: पद्म भूषण, पद्म विभूषण, भारत रत्न

एक द्वीपीय शहर से एयरोनॉटिक्स तक

भारत में शायद ही कोई वैज्ञानिक डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जितना लोकप्रिय हो। लेकिन उन्हें सिर्फ़ ‘मिसाइल मैन’ या ‘जनता के राष्ट्रपति’ कहना कहानी का बड़ा हिस्सा छोड़ देता है। उनका सफ़र एक छोटे द्वीपीय शहर से शुरू होकर भारत के अपने प्रक्षेपण यानों, मिसाइल कार्यक्रमों, विज्ञान नीति और अंत में युवाओं से लगातार संवाद तक पहुँचा।

आधिकारिक जीवनी के अनुसार उनका जन्म 15 अक्टूबर 1931 को रामेश्वरम में हुआ। उन्होंने मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में विशेषज्ञता हासिल की। यही पढ़ाई उन्हें पहले DRDO और फिर ISRO ले गई, इंजीनियरों की उस पीढ़ी में जो भारत को प्रक्षेपण-यान तकनीक में आत्मनिर्भर बनाना चाहती थी।

SLV-III: पहले असफलता, फिर सफलता

ISRO में वे भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान SLV-III के प्रोजेक्ट डायरेक्टर थे। पहला प्रयास विफल रहा। जुलाई 1980 में SLV-III ने रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की निकट कक्षा में स्थापित किया।

कलाम ने बाद में बताया कि असफलता के बाद क्या हुआ। ISRO के तत्कालीन प्रमुख सतीश धवन ख़ुद प्रेस के सामने आए और ज़िम्मेदारी ली। अगला प्रक्षेपण सफल हुआ तो धवन ने कलाम और उनकी टीम को मीडिया के सामने आगे कर दिया। कलाम इसे अपने जीवन के सबसे बड़े सबकों में गिनते थे: गड़बड़ हो तो नेता ज़िम्मेदारी ले, सफलता मिले तो श्रेय टीम को जाए।

मिसाइल और सामरिक तकनीक

DRDO में वे एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) के मुख्य कार्यकारी रहे। अग्नि और पृथ्वी इसी बड़े साझा प्रयास का हिस्सा थे। 1992 से 1999 तक वे रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार और रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव रहे।

पोखरण-II के दौर में उनकी भूमिका परमाणु ऊर्जा विभाग और कई वैज्ञानिक-तकनीकी टीमों के साथ मिलकर निभाई गई थी। किसी एक व्यक्ति को पूरे कार्यक्रम का निर्माता बताना सही नहीं है।

राष्ट्रपति से फिर शिक्षक

2002 से 2007 तक वे भारत के 11वें राष्ट्रपति रहे। पद छोड़ते ही वे फिर शिक्षा की ओर लौट गए। अन्ना विश्वविद्यालय में अकादमिक काम, स्कूलों-कॉलेजों में लगातार जाना और ‘इग्नाइटेड माइंड्स’ जैसी किताबें, इन सबने उन्हें विज्ञान को आम लोगों तक पहुँचाने वाले और युवाओं के मार्गदर्शक के रूप में अलग पहचान दी।

उन्हें 1981 में पद्म भूषण, 1990 में पद्म विभूषण और 1997 में भारत रत्न मिला। 27 जुलाई 2015 को उनका निधन हुआ।

उनकी कहानी क्या सिखाती है

टीम की सफलता को किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं बनाना चाहिए। विज्ञान में असफलता अंत नहीं, सीख है। तकनीकी नेतृत्व तभी सबसे क़ीमती है जब वह जनहित से जुड़ा हो। और सम्मान मिलने के बाद भी सीखना और सिखाना जारी रह सकता है: कलाम आख़िरी दिन तक दोनों करते रहे।

स्रोत