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यानुंग जमोह लेगो
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कृषि · अरुणाचल प्रदेश

आदी पौध-ज्ञान की रखवाली

यानुंग जमोह लेगो ने कृषि-विज्ञान की पढ़ाई की, और फिर अपने पिता से आदी समुदाय का पौध-ज्ञान सीखा। उन्होंने जीवन भर यह सुनिश्चित किया कि यह ज्ञान उगाया, रोपा और सिखाया जाए, खोया न जाए।

यानुंग जमोह लेगोYanung Jamoh Lego
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यानुंग जमोह लेगो। फ़ोटो: पद्म पुरस्कार, भारत सरकार

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जन्म
9 जुलाई 1963, सिका तोदे गाँव
ज़िला
पूर्वी सियांग, अरुणाचल प्रदेश
क्षेत्र
पारंपरिक जड़ी-बूटी ज्ञान, औषधीय पौधे, कृषि
सम्मान
सृष्टि सम्मान 2007; पारंपरिक वैद्य रत्न 2013; अरुणाचल प्रदेश राज्य पुरस्कार 2019; पद्म श्री 2024
1988कृषि विभाग से जुड़ीं
2009इंडिजिनस हर्बल हेरिटेज शुरू
1,00,000+लोगों तक पहुँच (प्रशस्ति)

दो तरह की पढ़ाई

यानुंग जमोह लेगो की कहानी स्वदेशी ज्ञान और औपचारिक कृषि-शिक्षा के बीच एक पुल की कहानी है। आधिकारिक पद्म प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 9 जुलाई 1963 को पूर्वी सियांग के सिका तोदे गाँव में हुआ।

असम कृषि विश्वविद्यालय, जोरहाट से B.Sc. और M.Sc. के बाद वे 1988 में अरुणाचल प्रदेश कृषि विभाग से जुड़ीं और जुलाई 2023 तक सेवा में रहीं।

पिता की सीख से

जड़ी-बूटी ज्ञान की राह उन्हें अपने पिता से मिली, जो लोक-चिकित्सक थे। प्रशस्ति 1981 से लगभग 15 वर्षों की शागिर्दी और 1995 से उनकी स्वतंत्र पद्धति का कालक्रम देती है।

2009 में उन्होंने ‘इंडिजिनस हर्बल हेरिटेज’ नाम की पहल शुरू की, जिसका ध्यान औषधीय पौधों की खेती, घरेलू किचन गार्डन और पारंपरिक ज्ञान की जागरूकता पर था। प्रशस्ति के अनुसार यह पहल 1 लाख से अधिक लोगों तक औषधीय-पौधों की शिक्षा पहुँचा चुकी है और हर साल लगभग 5,000 औषधीय पौधे लगाती है।

सम्मान भी, प्रमाण भी

उनके परिचय का चिकित्सा वाला हिस्सा सावधानी माँगता है। प्रशस्ति में इलाज के दावे हैं, जिनमें मरीज़ों की आपस में न मिलने वाली संख्याएँ और गंभीर बीमारियाँ ठीक करने की बातें शामिल हैं। ये एक सरकारी प्रशस्ति के दावे हैं, और यह संग्रह इन्हें क्लिनिकल रूप से सिद्ध नहीं बताता।

उनका सबसे मज़बूत और सबसे अच्छी तरह दर्ज योगदान पारंपरिक औषधीय-पौधों के ज्ञान को बचाना, उगाना और सिखाना है, और यहाँ हम उसी का सम्मान करते हैं।

स्रोत