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विजयलक्ष्मी देशमाने
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चिकित्सा · कर्नाटक

कलबुर्गी की बस्ती से कैंसर ऑपरेशन थिएटर तक

विजयलक्ष्मी देशमाने ने माँ के साथ सब्ज़ी बेची और मेडिकल कॉलेज में अंग्रेज़ी से जूझीं। फिर भी उन्होंने सर्जरी चुनी, और भारत के एक बड़े कैंसर संस्थान में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी का नेतृत्व करने वाली शुरुआती महिलाओं में बनीं।

विजयलक्ष्मी देशमानेVijayalakshmi Deshmane
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विजयलक्ष्मी देशमाने। फ़ोटो: पद्म पुरस्कार, भारत सरकार

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AI आवाज़ में सुनाई गई
जन्म
10 अप्रैल 1955
जड़ें
कलबुर्गी, कर्नाटक
करियर
किदवई मेमोरियल इंस्टीट्यूट ऑफ़ ऑन्कोलॉजी, बेंगलुरु
क्षेत्र
सर्जिकल ऑन्कोलॉजी, स्तन कैंसर शोध, चिकित्सा शिक्षण
सम्मान
कर्नाटक राज्योत्सव पुरस्कार 2004; पद्म श्री 2025
1985बेल्लारी में जनरल सर्जरी की पहली महिला MS छात्रा
~30वर्ष किदवई में
2025पद्म श्री

मुश्किलों के बीच

डॉ. विजयलक्ष्मी देशमाने की कहानी सामाजिक और आर्थिक बाधाओं के बीच शिक्षा की शक्ति की कहानी है। आधिकारिक पद्म प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 10 अप्रैल 1955 को कलबुर्गी की एक झुग्गी बस्ती में हुआ। वे मादिगा समुदाय से थीं; उनकी माँ फल-सब्ज़ियाँ बेचती थीं और पिता स्वतंत्रता सेनानी थे।

बाद के साक्षात्कारों में वे याद करती हैं कि पढ़ाई के साथ परिवार की आजीविका में हाथ बँटाना पड़ता था, और कन्नड़-माध्यम की पढ़ाई के बाद मेडिकल कॉलेज में अंग्रेज़ी एक कठिन बाधा बनी।

सर्जरी का चुनाव

उन्होंने 1980 में कर्नाटक मेडिकल कॉलेज, हुबली से MBBS किया और गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, बेल्लारी में जनरल सर्जरी की पहली महिला MS छात्रा बनीं; 1985 में MS पूरा किया। एसोसिएशन ऑफ़ सर्जन्स ऑफ़ इंडिया से सर्जिकल ऑन्कोलॉजी में फ़ेलोशिप मिली और टाटा मेमोरियल अस्पताल, मुंबई में ऑन्कोलॉजी का प्रशिक्षण लिया।

इसके बाद किदवई मेमोरियल इंस्टीट्यूट ऑफ़ ऑन्कोलॉजी, बेंगलुरु में तीन दशक का करियर बना। प्रशस्ति उन्हें सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग की पहली महिला सीनियर रेज़िडेंट और पहली महिला फ़ैकल्टी बताती है। 2015 में वे प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्ष के रूप में सेवानिवृत्त हुईं और संस्थान की प्रभारी निदेशक भी रहीं।

ऑपरेशन थिएटर से आगे

उनका काम ऑपरेशन थिएटर तक सीमित नहीं था। उन्होंने सीनियर रेज़िडेंट्स और MS तथा MCh सर्जिकल ऑन्कोलॉजी के विद्यार्थियों को प्रशिक्षित किया, स्तन कैंसर पर वैश्विक शोध परियोजनाओं में प्रधान अन्वेषक रहीं और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध प्रस्तुत किया।

बाद में उन्होंने कर्नाटक कैंसर सोसाइटी का नेतृत्व किया और कैंसर जागरूकता पर काम किया। उनकी यात्रा इसलिए अहम है क्योंकि इसमें निजी जुझारूपन के साथ चिकित्सा व्यवस्था की क्षमता बढ़ाने का काम भी शामिल है।

स्रोत