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वेलु आसान
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कला और संस्कृति · तमिलनाडु

पराई के आसान

वेलु ने गरीबी में पिता के साथ, जल्लीकट्टू और मंदिर-जुलूसों में पराई बजाना सीखा। दशकों बाद विद्यार्थी उन्हें 'आसान', यानी शिक्षक, कहते हैं, और पराई उनके साथ दुनिया भर के मंचों तक पहुँची है।

वेलु आसानVelu Aasaan
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वेलु आसान। फ़ोटो: पद्म पुरस्कार, भारत सरकार

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AI आवाज़ में सुनाई गई
जन्म
20 मई 1970
क्षेत्र
अलंगानल्लूर और मदुरै, तमिलनाडु
कार्यक्षेत्र
पराई (थप्पु) लोक-ताल, प्रशिक्षण, वाद्य-निर्माण
सम्मान
पराई इसै सिर्पी पुरस्कार 2015; कलै नन्मणि 2021; पद्म श्री 2025
110+अडवु, 52 से बढ़कर
1,200+कार्यक्रम और प्रशिक्षण
35+तमिल और तेलुगु फ़िल्में

बचपन में सीखा ढोल

वेलु आसान की कहानी एक ऐसे लोकवाद्य की सामाजिक यात्रा से जुड़ी है जिसे लंबे समय तक सीमित अवसरों और कलंक के साथ देखा गया। आधिकारिक पद्म प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 20 मई 1970 को हुआ। गरीबी के कारण उनकी पढ़ाई चौथी कक्षा से आगे नहीं बढ़ी, और लगभग 10 वर्ष की उम्र से वे पिता के साथ अलंगानल्लूर जल्लीकट्टू, मंदिर उत्सवों और कभी-कभी अंतिम यात्राओं में पराई बजाने लगे।

52 से 110 क़दम

समय के साथ उन्होंने पराई को ख़ास मौक़ों पर बजने वाले वाद्य से एक व्यवस्थित प्रदर्शन-भाषा में बदला। प्रशस्ति के अनुसार याद में बसे 52 अडवु (क़दम और पैटर्न) से शुरू हुआ उनका संग्रह पारंपरिक ज्ञान के आधार पर आज 110 से अधिक रूपों तक पहुँचा है।

वे कलाकार के साथ शिक्षक भी बने और स्कूलों, कॉलेजों और लोक-मंडलियों को संगीत, नृत्य और प्रदर्शन सिखाने लगे; इसी से उनका नाम “आसान” पड़ा। वे चमड़े के वाद्य बनाने में भी माहिर हैं, और प्रशस्ति उनके हाथों बने हज़ारों वाद्यों का उल्लेख करती है।

पराई को दुनिया तक

तीन दशकों में उन्होंने 1,200 से अधिक कार्यक्रम और प्रशिक्षण दिए, पराई परंपरा को अमेरिका, चीन, मलेशिया और सिंगापुर तक पहुँचाया, और 35 से अधिक तमिल और तेलुगु फ़िल्मों में काम किया। 2001 के बाद उन्होंने मदुरै में थप्पाट्टा कलैञर्गल संगम जैसे प्रयासों से लोक कलाकारों को जोड़ा।

उनका पद्म श्री केवल उनकी प्रस्तुति का नहीं, उस परंपरा की पहचान का भी सम्मान है जिसे उन्होंने कक्षा, मंच और दुनिया से जोड़ा।

स्रोत