समुद्र पर एक तमिल सेनापति
वरुणकुलत्तन की कहानी को आधुनिक राष्ट्रवादी शब्दावली में सरल बना देना आसान है, लेकिन इतिहास अधिक जटिल है। संस्कृति मंत्रालय की “गुमनाम नायक” प्रविष्टि उन्हें तंजावुर से जुड़े तमिल योद्धा और नौसेना सेनापति के रूप में प्रस्तुत करती है, जिन्होंने 1616 से 1621 के बीच पुर्तगाली औपनिवेशिक विस्तार का विरोध किया।
ऐतिहासिक शोध में उनका नाम वरुणकुलत्तन के साथ खेम नायक या चेम नायक के रूप में भी मिलता है।
जाफ़ना, 1619
उस समय जाफ़ना राज्य राजनीतिक संकट से गुज़र रहा था। कांकिली द्वितीय ने तंजावुर के नायक शासक रघुनाथ नायक से सहायता माँगी, और ऐतिहासिक अध्ययनों के अनुसार एक बड़ी सेना वरुणकुलत्तन की कमान में भेजी गई।
जून 1619 की पुर्तगाली विजय के दौरान एक नौसैनिक अभियान को प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, जबकि दूसरे, स्थल अभियान ने अंततः जाफ़ना राज्य को हरा दिया। विजय के बाद भी 1620–21 में विद्रोह हुए, जिनमें तंजावुर-समर्थित सेनाओं और वरुणकुलत्तन का नाम दर्ज है।
उन्हें उनके समय में पढ़ना
इसीलिए उनकी कहानी को ब्रिटिश राज से आज़ादी जैसी बाद की श्रेणी में यांत्रिक रूप से नहीं रखना चाहिए। यह 17वीं सदी का क्षेत्रीय संप्रभुता और समुद्री शक्ति का संघर्ष था, पुर्तगाली औपनिवेशिक विस्तार के विरुद्ध।
फिर भी भारत सरकार का स्मरणात्मक ढाँचा उन्हें शुरुआती उपनिवेश-विरोधी प्रतिरोध की परंपरा में स्थान देता है। दोनों दृष्टिकोण साथ रखने से कहानी अधिक ईमानदार और ऐतिहासिक रूप से उपयोगी बनती है।
स्रोत
- संस्कृति मंत्रालय: गुमनाम नायक, वरुणकुलत्तन
- SOAS: चंद्र आर. डी सिल्वा, द पोर्चुगीज़ इन सीलोन, 1617–1638
- गूगल बुक्स: द पोर्चुगीज़ इन सीलोन, 1617–1638
- amritmahotsav.nic.in/unsung-heroes-detail.htm?29326=
- soas-repository.worktribe.com/output/387469/the-portuguese-in-ceylon-1617-1638
- books.google.com/books/about/The_Portuguese_in_Ceylon_1617_1638.html?id=4OeGAQAACAAJ