पशुओं के साथ एक बालक
तागा राम भील की कहानी थार रेगिस्तान के चरवाहा जीवन से अंतरराष्ट्रीय लोक-मंचों तक जाती है। आधिकारिक पद्म प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 17 अप्रैल 1960 को जैसलमेर के मूलसागर गाँव में हुआ।
सात वर्ष की उम्र में पशु चराते हुए उन्होंने पिता से और ख़ुद अभ्यास करके अलगोज़ा, यानी साथ बजने वाली दो बाँसुरियाँ, बजाना सीखना शुरू किया।
गोपा चौक से दुनिया तक
1981 में जैसलमेर के गोपा चौक पर स्वतंत्रता दिवस की प्रस्तुति ने उनका सार्वजनिक जीवन बदल दिया। बाद में उन्होंने उस्ताद अकबर ख़ान से प्रशिक्षण लिया और 1986 में सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र से छात्रवृत्ति पाई।
राजस्थान के मरु उत्सवों से लेकर यूरोप, जापान, सिंगापुर और अमेरिका के लोक-उत्सवों तक उन्होंने अलगोज़ा की आवाज़ को बड़े श्रोताओं तक पहुँचाया।
अगली साँस को सिखाना
वे मूलसागर में अलगोज़ा लोक संगीत संस्थान के संस्थापक और निदेशक हैं। उनके काम का असली महत्व प्रदर्शन से आगे, उसे सौंपने में है: मौखिक परंपरा से चलने वाला वाद्य और उसका संगीत तभी बचता है जब अगली पीढ़ी सीखती रहे।
2026 के पद्म श्री ने थार के इस लोक-ज्ञान को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में पहचान दी।
स्रोत
- पद्म पुरस्कार 2026: आधिकारिक प्रशस्ति
- PIB: राजस्थान परिचय
- सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय: वीडियो
- padmaawards.gov.in/Document/pdf/CitationsForTickets/2026/English/2026123.pdf
- pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2265221&lang=2®=48
- youtube.com/watch?v=KqclrOPTJF4