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स्मृति रेखा चकमा
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कला और संस्कृति · त्रिपुरा

जंगल से रंग लेने वाली बुनकर

स्मृति रेखा चकमा ने बचपन में चकमा लॉइन लूम सीखा, फिर जंगल को सीखा: कौन-सी छाल, जड़, पत्ती, फूल और बीज कौन-सा रंग देता है। उन्होंने जीवन भर ये दोनों हुनर दूसरी महिलाओं तक पहुँचाए।

स्मृति रेखा चकमाSmriti Rekha Chakma
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स्मृति रेखा चकमा। फ़ोटो: पद्म पुरस्कार, भारत सरकार

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AI आवाज़ में सुनाई गई
जन्म
20 सितंबर 1964
राज्य
त्रिपुरा
क्षेत्र
चकमा लॉइन-लूम बुनाई, प्राकृतिक रंग, ग्रामीण महिलाओं की आजीविका
सम्मान
राष्ट्रीय पुरस्कार 2000; संत कबीर पुरस्कार 2018; पद्म श्री 2024
1999'उजेइया जधा' की स्थापना
4प्रशिक्षु राष्ट्रीय पुरस्कार तक पहुँचीं
2024पद्म श्री

करघा और जंगल

स्मृति रेखा चकमा की कहानी स्वदेशी वस्त्र-ज्ञान को आधुनिक डिज़ाइन और ग्रामीण आजीविका से जोड़ती है। आधिकारिक पद्म प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 20 सितंबर 1964 को हुआ और उन्होंने बचपन से पारंपरिक लॉइन लूम पर बुनाई सीखी।

बाद में उन्होंने जंगल से मिलने वाले पौधों, यानी छाल, जड़ों, पत्तियों, फूलों और बीजों से सूती धागे के प्राकृतिक रंग विकसित किए।

त्रिपुरा से आगे

उनकी कला केवल निजी हुनर नहीं रही। कार्यशालाओं, प्रदर्शनों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के ज़रिए वे चकमा बुनाई को कई राज्यों और विदेशों तक ले गईं। ढाका और यांगून जैसे अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों ने इस स्थानीय शिल्प को सरहद-पार मंच दिया।

दूरदर्शन और फ़िल्म्स डिवीज़न ने उनकी बुनाई और हर्बल रंगाई पर वृत्तचित्र बनाए।

उस्ताद से मार्गदर्शक

1999 में उन्होंने ग्रामीण महिलाओं की शिक्षा और आर्थिक उन्नति के लिए ‘उजेइया जधा’ संस्था बनाई। इसके प्रशिक्षण केंद्रों में मुफ़्त भोजन, रहने की जगह और वज़ीफ़ा दिया गया, और प्रशस्ति के अनुसार उनकी चार प्रशिक्षु आगे चलकर राष्ट्रीय पुरस्कार तक पहुँचीं।

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि शायद उनका अपना पुरस्कार नहीं, उन महिलाओं की सफलता है जिन्होंने उनसे सीखा। पारंपरिक ज्ञान तभी टिकता है जब अगली पीढ़ी उससे रोज़ी कमा सके।

स्रोत