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श्वेता शर्मा
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शिक्षा · झारखंड

वह शिक्षिका जिसने एक स्कूल को बंद होने से बचाया

ग्रामीण झारखंड में श्वेता शर्मा का पहला स्कूल बंद होने की कगार पर था। दो साल की आनंद भरी, खेल-खेल वाली पढ़ाई के बाद वहाँ ज़्यादा बच्चे आने लगे, और बच्चों को स्कूल से जोड़े रखना उनके पूरे काम का सूत्र बन गया।

श्वेता शर्माShweta Sharma
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अपनी शिक्षण सामग्री के साथ श्वेता शर्मा। फ़ोटो: दैनिक जागरण

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AI आवाज़ में सुनाई गई
स्कूल
राजकीय मध्य विद्यालय विवेकानंद, देवघर
राज्य
झारखंड
अनुभव
20+ वर्ष का अध्यापन
सम्मान
राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2025
20+वर्ष का अध्यापन
2साल में बंद होते स्कूल का नामांकन बढ़ाया
2025राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार

कगार पर खड़ा एक स्कूल

श्वेता शर्मा की कहानी अपनी शुरुआत में सबसे दिलचस्प है। उनकी आधिकारिक राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार प्रशस्ति के अनुसार उन्होंने करियर की शुरुआत ऐसे ग्रामीण स्कूल से की जहाँ बहुत कम बच्चे थे और जो बंद होने की कगार पर था। स्वागत भरी, गतिविधियों वाली कक्षा बनाकर और माता-पिता व बच्चों का भरोसा जीतकर उन्होंने दो साल में नामांकन बढ़ा दिया।

उनके काम का यही सबसे अहम मापने लायक हिस्सा है। उनकी पढ़ाई का पहला नतीजा कोई तकनीक या पुरस्कार नहीं था। पहला नतीजा था बच्चों का स्कूल में टिकना।

खेल-खेल में सीखना

उनकी पढ़ाई में खेल-आधारित तरीक़ों, गतिविधियों, और पढ़ने-लिखने व गिनती की बुनियाद पर ज़ोर रहा है। उन्होंने राज्य स्तर की शैक्षिक पहलों और पाठ्यपुस्तकों व शिक्षण सामग्री के विकास में भी योगदान दिया है।

अबुआ जादुई पिटारा

उनका ‘अबुआ जादुई पिटारा’ (हमारा जादुई पिटारा) खिलौनों पर आधारित एक स्थानीय किट है, जो कक्षा की पढ़ाई को झारखंड की आदिवासी और सांस्कृतिक छवियों और बच्चों के अपने परिवेश से जोड़ती है। स्थानीय रिपोर्टों में इसके हिस्सों के रूप में सोहराय कला, बैद्यनाथधाम की छवियों और पारंपरिक वाद्यों का ज़िक्र है। यह राष्ट्रीय पाठ्यक्रम के विचारों को देवघर के बच्चे की समझ में ढालने का अच्छा उदाहरण है।

कॉपी एक्सचेंज प्रोग्राम

कोविड के दौरान उन्होंने बच्चों के बीच आपसी ‘कॉपी एक्सचेंज प्रोग्राम’ की सह-स्थापना की, जिसमें बच्चे अपने नोट्स साझा करते और एक-दूसरे को पढ़ाई जारी रखने में मदद करते थे। आधिकारिक प्रशस्ति इसे कक्षाएँ बंद होने के दौर में बच्चों की पढ़ाई जारी रखने से जोड़ती है।

सम्मान

आधिकारिक रिकॉर्ड 20 से ज़्यादा वर्षों के अध्यापन और 2025 के राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार को दर्ज करता है। स्वतंत्र रिपोर्टें उन्हें उस वर्ष झारखंड से पुरस्कार पाने वाली शिक्षिका बताती हैं।

उनका काम याद दिलाता है कि बच्चों का स्कूल में टिके रहना ख़ुद अच्छी शिक्षा का पैमाना है, कि स्थानीय कला और संस्कृति पढ़ाई को जीवंत बना सकती है, और संकट में बच्चों का एक-दूसरे की मदद करना भी कक्षा को आगे ले जा सकता है।

स्रोत