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श्रीरंग देवबा लाड
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कृषि · महाराष्ट्र

दादा लाड की कपास की कतारें

श्रीरंग लाड ने परभणी में अपने खेतों को प्रयोगशाला की तरह देखा। कपास के पौधों की दूरी और देखभाल का उनका तरीका किसानों में 'दादा लाड तकनीक' के नाम से जाना गया, और शोध-वैज्ञानिक उसे परखने आए।

श्रीरंग देवबा लाडShrirang Devaba Lad
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श्रीरंग देवबा लाड। फ़ोटो: पद्म पुरस्कार, भारत सरकार

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AI आवाज़ में सुनाई गई
जन्म
1 जनवरी 1947, मालसोन्ना गाँव
ज़िला
परभणी, महाराष्ट्र
क्षेत्र
कपास तकनीक, टिकाऊ खेती, किसान प्रशिक्षण
सम्मान
मानद D.Sc. 2025; पद्म श्री 2026
1947मालसोन्ना में जन्म
2025मानद D.Sc.
2026पद्म श्री

खेत ही प्रयोगशाला

श्रीरंग देवबा लाड, जिन्हें कई किसान “दादा लाड” कहते हैं, खेत में किए गए कृषि-प्रयोगों का उदाहरण हैं। आधिकारिक पद्म प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 1 जनवरी 1947 को परभणी ज़िले के मालसोन्ना गाँव में हुआ।

कॉलेज की पढ़ाई के बाद उन्होंने लंबे समय तक ग्रामीण संगठनों और किसान नेटवर्क के साथ काम किया और खेती को व्यावहारिक शोध का क्षेत्र बनाया।

दादा लाड तकनीक

उनकी सबसे बड़ी पहचान कपास उगाने के एक तरीके से है। प्रशस्ति कहती है कि उनकी तकनीक ने पौधों की दूरी, पौध-प्रबंधन और अच्छी कृषि पद्धतियों के ज़रिए कपास की उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार दिखाया। इसी तरह उन्होंने ज्वार और तुअर पर भी प्रयोग किए।

प्रशस्ति में केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, नागपुर द्वारा उनकी तकनीकों के मूल्यांकन का उल्लेख है। 2026 के संसद टीवी साक्षात्कार में इस तकनीक को सघन रोपण, कम लागत, वैज्ञानिक फ़सल-प्रबंधन और टिकाऊ खेती के संदर्भ में समझाया गया।

किसान ही शोधकर्ता

वे देसी गोवंश और किसान प्रशिक्षण से भी जुड़े रहे। उनकी कहानी प्रयोगशाला और खेत के बीच की दूरी कम करती है।

नवाचार तब सबसे मज़बूत होता है जब किसान अवलोकन, प्रयोग और संस्थागत परख को साथ लाता है, और फिर किसान एक-दूसरे से सीखते हैं।

स्रोत