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शंकर बाबा पुंडलिकराव पापळकर
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समाज सेवा · महाराष्ट्र

अनाथ बच्चों को पिता का नाम

शंकर बाबा पापळकर ने अमरावती के बाहर एक बंजर ज़मीन पर चार दिव्यांग लड़कियों से शुरुआत की। उन्होंने जिन बच्चों को अपनाया, उन्हें सिर्फ़ छत नहीं दी: उनके पहचान-पत्रों पर पिता के रूप में अपना नाम भी दिया।

शंकर बाबा पुंडलिकराव पापळकरShankar Baba Pundlikrao Papalkar
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शंकर बाबा पापळकर। फ़ोटो: पद्म पुरस्कार, भारत सरकार

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जन्म
14 फ़रवरी 1942
ज़िला
अमरावती, महाराष्ट्र
क्षेत्र
अनाथ और दिव्यांग बच्चों का पुनर्वास
सम्मान
मानद D.Litt.; पद्म श्री 2024
4लड़कियाँ, जब आश्रम शुरू हुआ
123निवासी, प्रशस्ति के समय
2024पद्म श्री

चार बच्चियाँ और एक बंजर ज़मीन

डॉ. शंकर बाबा पुंडलिकराव पापळकर ने अपना जीवन उन बच्चों को परिवार और पहचान देने में लगाया जिन्हें संस्थागत व्यवस्थाओं में अक्सर सबसे कम सुरक्षा मिलती है। आधिकारिक पद्म प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 14 फ़रवरी 1942 को हुआ।

1990 में अमरावती से लगभग 50 किमी दूर वझ्झर में उन्हें 25 एकड़ ज़मीन मिली, जहाँ उन्होंने दिव्यांग और बेसहारा बच्चों के लिए स्व. अंबादासपंत अनाथालय शुरू किया। शुरुआत केवल चार दिव्यांग लड़कियों से हुई।

छत ही नहीं, एक नाम

प्रशस्ति के समय आश्रम में 98 लड़कियाँ और 25 लड़के, कुल 123 बच्चे थे। पापळकर ने आश्रय से आगे पहचान पर ज़ोर दिया: प्रशस्ति के अनुसार इन बच्चों के आधार रिकॉर्ड में पिता के रूप में उनका नाम दर्ज है।

उन्होंने विवाह-योग्य निवासियों के विवाह करवाए और उन्हें सरकारी नौकरियों और बैंक खातों तक पहुँचने में मदद की। प्रशस्ति 21 बेटियों और 3 बेटों के विवाह और 12 निवासियों के सरकारी नौकरियों तक पहुँचने का उल्लेख करती है।

अठारह पर ख़त्म न होने वाली देखभाल

वझ्झर मॉडल एक कठिन सवाल उठाता है: उन वयस्कों का क्या, जो 18 वर्ष के बाद भी अपने बल पर नहीं जी सकते? आश्रम की बंजर ज़मीन को हज़ारों पेड़ों से हरे परिसर में बदलना भी पुनर्वास की इसी सोच का हिस्सा रहा।

पद्म श्री के बाद भी पापळकर ने अनाथ दिव्यांग वयस्कों के संरक्षण के लिए क़ानून और नीति में बदलाव की माँग सार्वजनिक रूप से उठाई है।

स्रोत