जो खो रहा था, उसे बचाना
सत्यनारायण बेलेरी का काम उस जैव-विविधता को बचाने का है जो आधुनिक खेती के दबाव में चुपचाप गायब हो सकती थी। उनका जन्म 15 जून 1973 को हुआ और वे कासरगोड के नेट्टनिगे क्षेत्र से हैं। आधिकारिक पद्म प्रशस्ति उन्हें किसान से धान-संरक्षक बने व्यक्ति के रूप में दर्ज करती है।
उनके संग्रह में केरल और कर्नाटक की आज़ादी से पहले की किस्में, औषधीय चावल और कई स्थानीय बीज शामिल हैं।
एक मुलाक़ात, एक बीज
एक मुलाक़ात ने उनकी दिशा बदल दी। उडुपी के गांधीवादी जैविक किसान चेरकाडी रामचंद्र राव से मिलने के बाद उन्होंने एक बीज, राजकायमा चावल, से संरक्षण शुरू किया। फिर वे केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में घूमकर पारंपरिक किस्में इकट्ठा करने लगे।
धीरे-धीरे शौक़ मिशन बन गया और संग्रह 650 से अधिक धान किस्मों तक पहुँचा।
थैलों में धान
उनकी ज़मीन ऊँची-नीची लैटेराइट थी, साधारण धान के खेतों के लायक नहीं। इसलिए उन्होंने पॉलीबैग तरीका अपनाया, जिसमें हर किस्म को कम जगह में उगाया, काटा, सुखाया और रखा जाता है। प्रशस्ति के अनुसार उन्होंने लगभग 200 वर्ग मीटर में 650 किस्में बचाईं।
वे बीज शोध संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों और किसानों को मुफ़्त देते हैं। यही उनके काम की ख़ासियत है: संरक्षण किसी संग्रहालय में बंद नहीं रहता, खेतों तक लौटता है। वे सुपारी, जायफल, काली मिर्च, कटहल, मधुमक्खी-पालन और ग्राफ़्टिंग का ज्ञान भी सहेजते हैं।
स्रोत
- पद्म पुरस्कार 2024: आधिकारिक प्रशस्ति
- भारत के राष्ट्रपति: पद्म पुरस्कार 2024 प्रशस्तियाँ
- धान संरक्षण पर साक्षात्कार
- padmaawards.gov.in/Document/pdf/CitationsForTickets/2024/202434.pdf
- presidentofindia.gov.in/sites/default/files/2024-05/padma_awardees_citation_compressed.pdf
- youtube.com/watch?v=r1tj5wcOgso