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कला और संस्कृति · असम

खटपार सत्र के मुखौटा-रक्षक

असम की सत्रीया परंपरा में मुखौटा बाँस, कपड़े, मिट्टी और रंग से बनता है, फिर मंच पर जाता है। रेबा कांता महंत ने पूरा जीवन इस कला के दोनों हिस्सों को ज़िंदा रखने में लगाया।

रेबा कांत महंतReba Kanta Mahanta
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AI आवाज़ में सुनाई गई
जन्म
19 अप्रैल 1935
ज़िला
शिवसागर, असम
क्षेत्र
सत्रीया मुखौटा-निर्माण, मुखा भाओना, सांस्कृतिक संरक्षण
सम्मान
शिल्प गुरु; संगीत नाटक अकादमी सम्मान; पद्म श्री 2025
193519 अप्रैल को जन्म
1996तक प्रधानाध्यापक
2025पद्म श्री

पिता से सीखा

रेबा कांता महंत का जीवन असम की सत्रीया और मुखा भाओना परंपरा को जीवित रखने की कहानी है। 2025 की पद्म प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 19 अप्रैल 1935 को हुआ और उन्होंने मुखौटा-निर्माण और मुखा भाओना की कला अपने सत्राधिकार पिता से सीखी।

यह परंपरा बाँस, कपड़ा, मिट्टी का लेप, रंग और रंगमंच को जोड़ती है। एक मुखौटा अपने आप में शिल्प भी है और प्रदर्शन का हिस्सा भी।

कलाकार से कहीं ज़्यादा

शिवसागर के खटपार सत्र में उन्होंने केवल प्रदर्शन नहीं किया, बल्कि इस कला के इर्द-गिर्द संस्थान और दस्तावेज़ भी खड़े किए। उन्होंने एक बालिका उच्च विद्यालय की स्थापना में पहल की और 1996 तक उसके प्रधानाध्यापक रहे। वर्षों तक वे ज़िला सत्र महासभा के महासचिव और फिर अध्यक्ष रहे।

उन्होंने धर्म, संस्कृति और मुखौटा-निर्माण पर लेख लिखे और सत्र परिसर में एक संग्रहालय बनाया, जिसमें मुखौटे, वाद्य-यंत्र और सत्रीया सांस्कृतिक वस्तुएँ रखी हैं।

शिल्प, कहानी और मंच साथ-साथ

IGNCA ने खटपार सत्र की मुखा भाओना प्रस्तुति का दस्तावेज़ीकरण किया है, जो इस जीवित परंपरा को मिली संस्थागत पहचान दिखाता है।

उनके काम का मूल यह है कि उन्होंने मुखौटे को केवल सजावटी वस्तु नहीं बनने दिया। उसके रंगमंच, कहानियों और सामुदायिक प्रशिक्षण को भी साथ बचाया। 2025 का पद्म श्री इसी समग्र सांस्कृतिक सेवा का सम्मान है।

स्रोत