रायगढ़ शैली में जन्मे
रामलाल बरेठ रायगढ़ कथक परंपरा की उन अंतिम जीवित कड़ियों में गिने जाते हैं जिन्होंने दरबारी परंपरा को आधुनिक संस्थानों तक पहुँचाया। राष्ट्रपति भवन की पद्म प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 6 मार्च 1936 को हुआ।
उनके पिता पं. कार्तिकराम महाराज स्वयं रायगढ़ शैली के प्रतिष्ठित कथक नर्तक थे। रामलाल ने पिता, चक्रधर सिंह और गुरु पं. जयलाल महाराज से गुरु-शिष्य परंपरा में कथक, तबला और गायन सीखा।
दरबार से कक्षा तक
1956 में वे समाज कल्याण विभाग में कलाकार बने और 1980 तक काम किया। इसी दौर में उन्होंने रायगढ़ में चक्रधर संगीत विद्यालय स्थापित कर अनेक विद्यार्थियों को प्रशिक्षित किया।
1981 में मध्य प्रदेश सरकार के चक्रधर नृत्य केंद्र, भोपाल में उन्हें गुरु के रूप में बुलाया गया, जहाँ वे 2011 तक रहे। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ में रीडर के रूप में भी उन्होंने शोधार्थियों और नर्तकों का मार्गदर्शन किया।
संग्रहालय नहीं, एक रिले
उनका योगदान केवल मंचीय प्रदर्शन नहीं है। दशकों तक कार्यशालाओं, परीक्षाओं, संगोष्ठियों और विश्वविद्यालय प्रशिक्षण के ज़रिए उन्होंने रायगढ़ कथक की दुर्लभ बंदिशों और प्रदर्शन-सामग्री को जीवित रखा। उनके शिष्य देश-विदेश में प्रदर्शन और अध्यापन करते हैं।
2024 का पद्म श्री उस सांस्कृतिक रिले का सम्मान था जिसने एक दरबारी कला को औपचारिक शिक्षा और नई पीढ़ी तक पहुँचाया।
स्रोत
- भारत के राष्ट्रपति: पद्म पुरस्कार 2024 प्रशस्तियाँ
- PIB: अलंकरण फ़ोटो एल्बम
- छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग: सूची
- presidentofindia.gov.in/sites/default/files/2024-05/padma_awardees_citation_compressed.pdf
- pib.gov.in/ShowAlbum.aspx?albumid=167762
- cgculture.in/Activity.aspx?id=kZ8C%2F6RGrgYhrRmx0eo13w%3D%3D