सोलह की उम्र में एक फ़ैसला
राधा बहन भट्ट की यात्रा पहाड़ की लड़कियों की शिक्षा से शुरू होकर जंगल, पानी, शराबबंदी और ग्राम स्वराज तक जाती है। 2025 की आधिकारिक पद्म प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 16 अक्टूबर 1933 को उत्तराखंड के एक दूरस्थ क्षेत्र में हुआ।
किशोरावस्था में ही उन्होंने महिलाओं और लड़कियों के लिए काम करने का निर्णय लिया और 16 वर्ष की आयु में कौसानी में सरला बहन के लक्ष्मी आश्रम से जुड़ गईं।
गाँव-गाँव
1961 से 1963 के दौरान उन्होंने पिथौरागढ़ के बौगाड़ क्षेत्र में गांधीवादी तरीके से गाँव-आधारित सामाजिक काम का प्रयोग किया। किशोरों के छोटे मंडल, लड़कियों के लिए “वन आवर स्कूल” और बच्चों के व्यक्तित्व-विकास के कार्यक्रम शुरू किए।
1966 में लक्ष्मी आश्रम की ज़िम्मेदारी संभालने के बाद उन्होंने अल्मोड़ा और आसपास के ज़िलों में महिलाओं को शराब की समस्या के ख़िलाफ़ संगठित किया। सरकारी प्रशस्ति के अनुसार यह अभियान इतना असरदार रहा कि क्षेत्र में शराब की कई दुकानें बंद हुईं।
जंगल, खदानें और नदियाँ
1975 में वे चिपको आंदोलन से जुड़ीं। उन्होंने सोपस्टोन खदानों में ब्लास्टिंग और खुदाई के ख़िलाफ़ आंदोलन किया, जंगल और सामुदायिक चरागाह बचाने के लिए काम किया और वृक्षारोपण कार्यक्रम बढ़ाए।
पद्म प्रशस्ति 1.60 लाख से अधिक पेड़ लगाए जाने और जीवन भर अलग-अलग अभियानों में महिलाओं और लड़कियों के साथ 79,000 किलोमीटर की पदयात्राओं का उल्लेख करती है। 2008 में उन्होंने स्थानीय महिलाओं के साथ नदी बचाओ आंदोलन शुरू किया।
एक संघर्ष, दो हिस्से
उनका जीवन एक बात साफ़ कहता है: पहाड़ में महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण-संरक्षण अलग-अलग विषय नहीं, अक्सर एक ही संघर्ष के दो हिस्से हैं।
स्रोत
- पद्म पुरस्कार 2025: आधिकारिक प्रशस्ति
- जमनालाल बजाज फ़ाउंडेशन: पुरस्कार परिचय
- लक्ष्मी आश्रम: पृष्ठभूमि
- padmaawards.gov.in/Document/pdf/CitationsForTickets/2025/2025105.pdf
- jamnalalbajajfoundation.org/awards/archives/1991/women-and-child-welfare/radha-bhatt
- lakshmiashram.dk/en/om-ashrammen/