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पंडी राम मंडावी
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कला और संस्कृति · छत्तीसगढ़

लकड़ी, बाँस और पिता की सीख

पंडी राम मंडावी चौथी कक्षा से आगे नहीं पढ़ सके। लकड़ी और बाँस के बारे में वे जो कुछ जानते हैं, सब बस्तर में अपने पिता से सीखा, और जब पद्म श्री मिला तो उन्होंने सारा श्रेय अपने पिता को दिया।

पंडी राम मंडावीPandi Ram Mandavi
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पंडी राम मंडावी। फ़ोटो: पीपल्स आर्काइव ऑफ़ रूरल इंडिया (PARI) के माध्यम से

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जन्म
12 फ़रवरी 1957, गढ़बेंगाल, बस्तर
समुदाय
मुरिया गोंड
कला
काष्ठ कला और सीटी वाली बाँस की बाँसुरी
सम्मान
पद्म श्री 2025
~24कारीगरों को कार्यशाला से रोज़गार
3देशों में कला का प्रदर्शन
2025पद्म श्री

पिता से सीखा

पंडी राम मंडावी की कला बस्तर के जंगल, लकड़ी, बाँस और मुरिया गोंड समुदाय की पीढ़ियों से चली आ रही शिल्प-स्मृति से निकली है। आधिकारिक प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 12 फ़रवरी 1957 को बस्तर के गढ़बेंगाल में हुआ। उनके पिता कुशल काष्ठ-शिल्पी थे, और छोटी उम्र से ही उन्होंने लकड़ी की कंघी, बाँसुरी और दूसरी उपयोगी-सांस्कृतिक वस्तुएँ बनाना सीखना शुरू किया।

बाद में उन्होंने लकड़ी की तलवारें, फरसे, धनुष, छड़ियाँ, तीर और ख़ास सीटी वाली बाँस की बाँसुरियाँ बनाईं। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार वे चौथी कक्षा से आगे नहीं पढ़ सके; वे अपने पिता को ही अपनी कला का असली गुरु मानते हैं।

गाँव में कार्यशाला

उनकी पहचान सिर्फ़ निजी हुनर से नहीं बनी। कार्यशालाओं और प्रदर्शनियों के ज़रिए वे मुरिया काष्ठ कला को क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक ले गए। प्रशस्ति बताती है कि वे अपने गाँव में एक कार्यशाला चलाते हैं जिससे लगभग दो दर्जन कारीगरों को रोज़गार मिलता है, और उनकी कला फ़्रांस, इटली और रूस सहित विदेशों में भी दिखाई गई है।

जिसका श्रेय, उसे

2025 के पद्म श्री ने उस कला को राष्ट्रीय पहचान दी जिसे अक्सर सिर्फ़ ‘आदिवासी शिल्प’ कहकर छोटा कर दिया जाता है। घोषणा के बाद उन्होंने सारा श्रेय अपने पिता को दिया, जो याद दिलाता है कि कई व्यक्तिगत पुरस्कारों के पीछे अनाम पारिवारिक गुरु और समुदाय का ज्ञान होता है।

विरासत तभी बचती है जब कारीगर उससे रोज़ी भी कमा सके, और नई पीढ़ी वह हुनर सीख सके।

स्रोत