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चिकित्सा · लद्दाख

एक आमची के घर से राष्ट्रीय संस्थान तक

डॉ. पद्मा गुरमेत ने लद्दाख में अपने पिता के साथ बैठकर सोवा-रिग्पा सीखा। फिर तीन दशक इस हिमालयी परंपरा को वह देने में लगाए जो उसके पास कभी नहीं था: सूचियाँ, पाठ्यक्रम और अपनी एक संस्था।

डॉ. पद्मा गुरमेतDr. Padma Gurmet
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AI आवाज़ में सुनाई गई
जन्म
15 अप्रैल 1971
स्थान
लेह, लद्दाख
क्षेत्र
सोवा-रिग्पा शोध और संस्था-निर्माण
सम्मान
केंद्र शासित लद्दाख राज्य पुरस्कार 2025; पद्म श्री 2026
1,500+चिकित्सा ग्रंथ सूचीबद्ध
525औषधीय पौधे दर्ज
1997आमची चिकित्सा अनुसंधान इकाई से जुड़े

घर पर सीखना

डॉ. पद्मा गुरमेत की कहानी पारंपरिक ज्ञान को सिर्फ़ विरासत के रूप में बचाने की नहीं, उसे संस्था, पाठ्यक्रम, शोध और नियमन से जोड़ने की है। आधिकारिक पद्म प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 15 अप्रैल 1971 को सोवा-रिग्पा परंपरा वाले परिवार में हुआ। उन्होंने बचपन से अपने पिता आमची ताशी रबस्तान ओंचुंग से यह परंपरा सीखी और बाद में केंद्रीय बौद्ध अध्ययन संस्थान, लेह से सोवा-रिग्पा की औपचारिक डिग्री ली।

शोध और रिकॉर्ड

1997 में वे केंद्रीय आयुर्वेद एवं सिद्ध अनुसंधान परिषद से जुड़े और लेह की आमची चिकित्सा अनुसंधान इकाई में शोध अधिकारी बने। वर्षों में इकाई का विस्तार हुआ और 2009 में यह राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान बनी। सोवा-रिग्पा की औपचारिक मान्यता, नीति, शोध और योजना के काम में वे लगातार शामिल रहे।

प्रशस्ति उनके नेतृत्व में 1,500 से ज़्यादा चिकित्सा ग्रंथों की सूची बनाने, 525 औषधीय पौधों को दर्ज करने, लगभग 1,200 नुस्ख़ों को दर्ज और डिजिटल करने, और 100 से ज़्यादा प्रजातियों वाले ट्रांस-हिमालयी जड़ी-बूटी उद्यान जैसी पहलों का उल्लेख करती है।

अपनी एक संस्था

राष्ट्रीय सोवा-रिग्पा संस्थान की स्थापना, और पहले निदेशक के रूप में उसका नेतृत्व, इस सफ़र का संस्थागत नतीजा था। 2026 का पद्म श्री देसी ज्ञान को शिक्षा, शोध और सार्वजनिक संस्थाओं से जोड़ने वाले उनके पुल का सम्मान है।

परंपरा तब टिकाऊ बनती है जब उसे दर्ज किया जाए, पढ़ाया जाए और संस्थाओं में जगह दी जाए। दूरदराज़ इलाक़े का ज्ञान भी राष्ट्रीय नीति का हिस्सा बन सकता है।

स्रोत