लौटकर कुछ बनाना
ओबैद सिद्दीकी का जन्म 7 जनवरी 1932 को बस्ती, उत्तर प्रदेश में हुआ। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के बाद उन्होंने ग्लासगो में माइक्रोबियल जेनेटिक्स में PhD की और अंतरराष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में काम किया।
1960 के दशक में होमी भाभा ने उन्हें मुंबई के TIFR बुलाया, और उन्होंने वहाँ आणविक जीवविज्ञान इकाई बनाने में मदद की। विदेश का शोध-करियर छोड़कर लगभग शून्य से यह कार्यक्रम खड़ा करना एक बड़ा फ़ैसला था।
जीन, गंध और व्यवहार
उनका शोध माइक्रोबियल जेनेटिक्स से तंत्रिका-आनुवंशिकी की ओर बढ़ा। फल-मक्खी ड्रोसोफ़िला को मॉडल जीव बनाकर उन्होंने गंध, स्वाद और तंत्रिका-तंत्र के काम के आनुवंशिक आधार का अध्ययन किया।
इस तरह उन्होंने दिमाग़ और व्यवहार के सवालों को आनुवंशिकी के औज़ारों से जोड़ा: अगर एक जीन बदल जाए, तो जीव के दुनिया को महसूस करने का तरीक़ा कैसे बदलता है?
लोगों की विरासत
बैंगलोर में नेशनल सेंटर फ़ॉर बायोलॉजिकल साइंसेज़ की स्थापना के पीछे उनकी सोच अहम थी। TIFR के आणविक जीवविज्ञान समूह और NCBS ने भारतीय जीवविज्ञानियों की कई पीढ़ियाँ तैयार कीं, और उनका मार्गदर्शन भारत में आधुनिक जीवन-विज्ञान का बड़ा स्तंभ बना।
कभी-कभी किसी वैज्ञानिक की सबसे बड़ी विरासत वे लोग और संस्थान होते हैं जो वह पीछे छोड़ता है। उन्होंने यह भी दिखाया कि वैज्ञानिक स्वतंत्रता और खुली बौद्धिक संस्कृति में प्रतिभा फलती-फूलती है।
स्रोत
- NCBS: प्रोफ़ेसर ओबैद सिद्दीकी
- NCBS
- TIFR
- news.ncbs.res.in/archivednews/page/professor-obaid-siddiqi-passes-away
- ncbs.res.in/
- tifr.res.in/