दो करियर, एक जीवन
किसी भाषा को बचाना धीमा और कठिन काम है, और इसका नतीजा किसी एक किताब से नहीं, दशकों की निरंतरता से आता है। आधिकारिक 2026 पद्म प्रशस्ति के अनुसार नरेश चंद्र देव वर्मा का जन्म 31 अक्टूबर 1944 को आज के सिपाहीजाला ज़िले में बिश्रामगंज के पास हुआ। उन्होंने धरियाथल प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई की और कलकत्ता विश्वविद्यालय के अंतर्गत MBB कॉलेज, अगरतला से BA किया।
उन्होंने कृषि विभाग में कनिष्ठ सहायक के रूप में शुरुआत की, बाद में त्रिपुरा विधानसभा सचिवालय से जुड़े और संयुक्त सचिव के पद तक पहुँचकर 2002 में सेवानिवृत्त हुए। इस करियर के साथ-साथ कोकबोरोक और त्रिपुरी संस्कृति पर काम से उनकी दूसरी, ज़्यादा स्थायी पहचान बनी।
चौंतीस किताबें
प्रशस्ति उन्हें कोकबोरोक, बांग्ला और अंग्रेज़ी में व्याकरण, साहित्य, संस्कृति और सामाजिक विषयों पर लेखन से जोड़ती है: कुल 34 किताबें, जिनमें कई कोकबोरोक में हैं। वे कोकबोरोक साहित्य परिषद से जुड़े रहे, त्रिपुरा विश्वविद्यालय के कोकबोरोक डिप्लोमा कार्यक्रम में अतिथि व्याख्याता रहे, और भाषा व साहित्य से जुड़ी सलाहकार भूमिकाएँ निभाईं।
त्रिपुरा से आगे पहचान
2024 के त्रिपुरा भूषण और 2026 के पद्म श्री ने उस काम को राष्ट्रीय पहचान दी जो लंबे समय तक मुख्यतः त्रिपुरा और कोकबोरोक-भाषी समुदाय के भीतर जाना जाता था।
किसी भाषा को बचाने के लिए सिर्फ़ उसे बोलना काफ़ी नहीं: उसे व्याकरण, पाठ, शोध और संस्थाओं में जगह चाहिए।
स्रोत
- PIB / पद्म पुरस्कार 2026: आधिकारिक प्रशस्तियाँ
- पद्म पुरस्कार 2026: अधिसूचना
- त्रिपुराइन्फ़ो: परिचय
- static.pib.gov.in/WriteReadData/specificdocs/documents/2026/jun/doc2026623901101.pdf
- padmaawards.gov.in/Document/pdf/Notifications/PadmaAwards/PadmaAwards2026.pdf
- tripurainfo.com/EnglishNews.aspx?intnid=7065
- neherald.com/tripura/padma-shri-awardee-naresh-chandra-dev-varma-hails-modi-govt-for-recognising-tribal-literature