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मुनीश्वर चंद्र डावर
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चिकित्सा · मध्य प्रदेश

₹2 से शुरू हुई आधी सदी की चिकित्सा सेवा

1971 के युद्ध से लौटे एक डॉक्टर ने जबलपुर में लगभग पचास साल तक अपनी फ़ीस इतनी कम रखी कि सबसे ग़रीब मरीज़ भी इलाज करा सके।

मुनीश्वर चंद्र डावरMunishwar Chandra Dawar
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जबलपुर में अपने क्लिनिक पर डॉ. मुनीश्वर चंद्र डावर

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AI आवाज़ में सुनाई गई
जन्म
16 जनवरी 1946
निधन
4 जुलाई 2025, जबलपुर
सेवा
कैप्टन, भारतीय सेना, 1971 का युद्ध
सम्मान
पद्म श्री 2023 (चिकित्सा)
₹21972 में उनकी पहली फ़ीस
50साल, लगभग, कम फ़ीस पर इलाज
~200मरीज़ रोज़, 2023 की रिपोर्ट के अनुसार
40+संस्थाओं ने सम्मानित किया

नई सरहद के उस पार जन्म

मुनीश्वर चंद्र डावर का जन्म 16 जनवरी 1946 को अविभाजित पंजाब के मॉन्टगोमरी ज़िले में हुआ, जो आज पाकिस्तान में है। 1947 के बँटवारे के बाद उनका परिवार जालंधर आ गया। उन्होंने एन. डी. विक्टर हायर सेकेंडरी स्कूल में पढ़ाई की और डी.ए.वी. कॉलेज, जालंधर से प्री-मेडिकल किया।

इसके बाद वे जबलपुर पहुँचे और गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, आज के नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज से MBBS किया; रिपोर्टों के अनुसार यह 1967 में पूरा हुआ। बाद की अख़बारी रिपोर्टों में लिखा है कि लगभग दो साल की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया और बचपन तंगी में बीता, हालाँकि उनके आधिकारिक प्रशस्ति-पत्र में इसका ज़िक्र नहीं है।

1971 के युद्ध में एक डॉक्टर

उनके आधिकारिक पद्म विवरण में दर्ज है कि वे कैप्टन के रूप में भारतीय सेना में शामिल हुए, 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में सेवा दी और बाद में स्वास्थ्य कारणों से समय से पहले सेवानिवृत्ति ली। सरकारी प्रकाशनों के अनुसार युद्ध के दौरान उनकी तैनाती बांग्लादेश की ओर थी, जहाँ उन्होंने घायल सैनिकों का इलाज किया, और लगभग एक साल सेवा के बाद 1972 में वे सेवानिवृत्त हुए।

उन्हें सेवा के तीन पदक मिले: पूर्वी स्टार (1971), संग्राम मेडल (1971) और स्वतंत्रता की 25वीं वर्षगाँठ मेडल। ये अभियान में सेवा के पदक हैं, वीरता पुरस्कार नहीं।

1972: ₹2 वाला क्लिनिक

जबलपुर लौटकर 1972 में उन्होंने निजी प्रैक्टिस शुरू की और परामर्श फ़ीस रखी सिर्फ़ ₹2। अगले पाँच दशकों में उन्होंने इसे बस कुछ ही बार बढ़ाया: 1986 में ₹3, 1997 में ₹5, 2012 में ₹10 और नवंबर 2021 में ₹20।

उनके आधिकारिक प्रशस्ति-पत्र के अनुसार इस कम फ़ीस से जबलपुर शहर और आसपास के गाँवों के कमज़ोर आर्थिक वर्ग को फ़ायदा मिला। कई ख़बरें इस क्रम को सरल बना देती हैं, लेकिन सबसे सटीक रिकॉर्ड प्रशस्ति-पत्र में ही है।

‘डावर की दवा’

जबलपुर में उनका क्लिनिक ‘डावर की दवा’ के नाम से जाना जाने लगा। भारत सरकार ने भी पद्म पुरस्कारों के प्रचार में उन्हें इसी नाम से याद किया। जनवरी 2026 की एक सरकारी प्रोफ़ाइल बताती है कि उनका क्लिनिक हमेशा मरीज़ों से भरा रहता था, और उस शिक्षक को याद करती है जिसने उन्हें सिखाया कि चिकित्सा सेवा है, शोषण का ज़रिया नहीं।

2023 में पद्म श्री की घोषणा पर उन्होंने एक समाचार एजेंसी से कहा कि उनका उद्देश्य हमेशा लोगों की सेवा करना था, इसीलिए फ़ीस इतनी कम रखी, और धैर्य व मेहनत ही उनकी सफलता की जड़ है। उस साल की रिपोर्टों के अनुसार वे रोज़ लगभग 200 मरीज़ देखते थे। स्थानीय ख़बरें यह भी बताती हैं कि जो मरीज़ पैसे नहीं दे पाते थे, उन्हें भी लौटाया नहीं जाता था; लोग अपनी हैसियत के मुताबिक़ जो बन पड़ता, मेज़ पर रख जाते।

पर्चे से आगे

उनका काम सिर्फ़ इलाज तक सीमित नहीं था। 2026 की सरकारी प्रोफ़ाइल के अनुसार वे नशे के ख़िलाफ़ भी काम करते थे, और पुरानी रिपोर्टें बताती हैं कि वे मरीज़ों को तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट और शराब छोड़ने के लिए समझाते थे।

आख़िरकार देश ने सम्मान दिया

देश से बहुत पहले स्थानीय और चिकित्सा संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया: 1994 में जबलपुर में टी. एन. शेषन के हाथों जन शक्ति सम्मान; 2009 में चिकित्सा रत्न और समाज सेवा के लिए मध्य प्रदेश इंडियन मेडिकल एसोसिएशन का डॉ. एस. के. मुखर्जी स्वर्ण पदक; जनवरी 2020 में जबलपुर कलेक्टर का प्रशंसा-पत्र; और अप्रैल 2022 में प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा मंत्री द्वारा सम्मान। बरसों में 40 से ज़्यादा संस्थाओं ने उनका अभिनंदन किया।

25 जनवरी 2023 को भारत सरकार ने चिकित्सा क्षेत्र में उन्हें पद्म श्री के लिए चुना। 5 अप्रैल 2023 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में उन्हें यह सम्मान दिया। बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जबलपुर यात्रा के दौरान उनसे मुलाक़ात की।

4 जुलाई 2025

डॉ. डावर का निधन 4 जुलाई 2025 को जबलपुर में 79 वर्ष की उम्र में हुआ। तब तक आधी सदी से ज़्यादा समय से उनका नाम शहर में सस्ते इलाज का पर्याय बन चुका था।

यह कहानी क्यों मायने रखती है

सुर्ख़ी ₹20 की फ़ीस है, लेकिन असली उपलब्धि महँगाई, बदलती अर्थव्यवस्था और चिकित्सा के बढ़ते कारोबार के बीच लगभग पचास साल तक इलाज को सस्ता बनाए रखना है। सेना का करियर जल्दी ख़त्म होना पूर्णविराम हो सकता था। वह उनकी ज़िंदगी के सबसे लंबे अध्याय की शुरुआत बन गया।

पहुँच भी चिकित्सा का असर है। हर योगदान नई दवा या नई मशीन नहीं होता। कभी-कभी वह दशकों तक, रोज़-रोज़, इलाज को लोगों की पहुँच में रखना होता है।

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