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डॉ. माया टंडन
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समाज सेवा · राजस्थान

अजनबियों को जान बचाना सिखाना

एनेस्थीसियोलॉजिस्ट के रूप में डॉ. माया टंडन ने अस्पताल के भीतर जानें बचाईं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने आम लोगों को सिखाना शुरू किया कि डॉक्टर के पहुँचने से पहले के मिनटों में सड़क पर जान कैसे बचाई जाए।

डॉ. माया टंडनDr. Maya Tandon
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डॉ. माया टंडन। फ़ोटो: सहायता ट्रस्ट

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AI आवाज़ में सुनाई गई
जन्म
20 फ़रवरी 1937, अजमेर
पेशा
एनेस्थीसियोलॉजिस्ट; वरिष्ठ शिक्षक, SMS मेडिकल कॉलेज, जयपुर
संस्था
सहायता (सड़क सुरक्षा और बेसिक लाइफ़ सेविंग प्रशिक्षण)
सम्मान
पद्म श्री 2024
1961MBBS
1995सेवानिवृत्ति के बाद ट्रस्ट की स्थापना
2024पद्म श्री

सेवानिवृत्ति के बाद दूसरा करियर

डॉ. माया टंडन की कहानी सेवानिवृत्ति के बाद शुरू होने वाले जनसेवा के दूसरे करियर की मिसाल है। उनकी आधिकारिक पद्म प्रशस्ति उन्हें एनेस्थीसियोलॉजिस्ट, सड़क सुरक्षा की पैरोकार और आपातकालीन जीवनरक्षक प्रशिक्षण की अग्रणी के रूप में दर्ज करती है।

उन्होंने 1961 में MBBS किया, एनेस्थीसिया में उच्च शिक्षा ली और ब्रिटेन में बाल एनेस्थीसिया फ़ेलोशिप से अनुभव हासिल किया। अपने चिकित्सा करियर में वे जयपुर के SMS मेडिकल कॉलेज और जे.के. लोन अस्पताल में वरिष्ठ शिक्षक और प्रशासक रहीं।

ब्रिटेन से मिला एक विचार

ब्रिटेन में उन्होंने आम लोगों को प्राथमिक प्रतिक्रिया का प्रशिक्षण पाते देखा। इससे उन्हें एक विचार मिला: डॉक्टर के दुर्घटना पीड़ित तक पहुँचने से पहले आम नागरिक भी जान बचाने के क़दम सीख सकते हैं। 1995 में सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने एक धर्मार्थ ट्रस्ट बनाया, जो आगे चलकर ‘सहायता’ बना और सड़क सुरक्षा व बेसिक लाइफ़ सेविंग प्रशिक्षण पर केंद्रित हुआ।

चिकित्सा को जन-कौशल बनाना

उनका मॉडल आम लोगों, ड्राइवरों, पुलिस, विद्यार्थियों और सामुदायिक स्वयंसेवकों को आपातकालीन प्रतिक्रिया के व्यावहारिक हुनर सिखाने पर टिका है। 2024 का पद्म श्री चिकित्सा ज्ञान को अस्पताल के बाहर जनता के काम आने वाले हुनर में बदलने की इस लंबी कोशिश की पहचान है।

आपात स्थिति में प्रशिक्षित राहगीर बहुत मायने रखते हैं, और पेशेवर ज्ञान समाज के एक से ज़्यादा तरीक़ों से काम आ सकता है। प्रशिक्षण की गुणवत्ता सिर्फ़ संख्या से ज़्यादा अहम है।

स्रोत