चाक के बिना एक कला
मचिहन सासा मणिपुर के उखरुल ज़िले की लोंगपी काले मिट्टी के बर्तनों की परंपरा के उस्ताद कारीगर हैं। इस कला में कुम्हार का चाक इस्तेमाल नहीं होता: स्थानीय काले सर्पेंटाइन पत्थर को एक ख़ास भूरी मिट्टी के साथ मिलाकर बर्तन हाथ से गढ़े जाते हैं।
उनका जन्म 1 अप्रैल 1950 को लोंगपी काजुई में हुआ। सीमित औपचारिक शिक्षा के बावजूद उन्होंने बचपन में अपने पिता और गाँव के कारीगरों से यह कला सीखी।
पुरानी तकनीक, नए रूप
उन्होंने पारंपरिक तकनीक को चाय सेट, केतली, फूलदान, मग, प्लेट और रसोई के बर्तनों जैसे आज के उत्पादों तक बढ़ाया, जिससे आज के बाज़ार में इस कला की जगह मज़बूत हुई। विरासत बचाने का मतलब नवाचार रोकना नहीं होता।
शिष्यों की विरासत
आधिकारिक प्रशस्ति प्रशिक्षक के रूप में उनकी भूमिका पर ज़ोर देती है और बताती है कि उनके कई शिष्य आगे चलकर राष्ट्रीय और राज्य पुरस्कारों तक पहुँचे। 1979 से 2024 के पद्म श्री तक का उनका सम्मानों का सफ़र लगभग आधी सदी की कारीगरी को दिखाता है।
किसी उस्ताद कारीगर की असली विरासत उसके सिखाए लोग हैं, और स्थानीय सामग्री टिकाऊ डिज़ाइन की नींव बन सकती है।
स्रोत
- पद्म पुरस्कार 2024: आधिकारिक प्रशस्ति
- MyGov मणिपुर: मचिहन सासा पर फ़ीचर
- MyGov: परिचय वीडियो
- padmaawards.gov.in/Document/pdf/CitationsForTickets/2024/2024108.pdf
- manipur.mygov.in/talk/shri-machihan-sasa-was-conferred-prestigious-padma-shri-award-2024/
- youtube.com/watch?v=Eun0_J4f-t4