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जयनाचरण बथारी
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कला और संस्कृति · असम

दीमा हसाओ का ढोल और बाँसुरी

दशकों तक जयनाचरण बथारी ने दो ज़िंदगियाँ साथ-साथ चलाईं: एक सरकारी नौकरी, और दिमासा लोगों के गीत। अपने गाँव में वे वह बुज़ुर्ग भी थे जिनके पास लोग सलाह के लिए जाते थे।

जयनाचरण बथारीJoynacharan Bathari
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जयनाचरण बथारी। फ़ोटो: इंडिया टुडे NE

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जन्म
1 जुलाई 1940
गाँव
जोराई बथारी, दीमा हसाओ, असम
संगीत
दिमासा लोकगीत; ख्राम ढोल और मुरी बाँसुरी
सम्मान
पद्म श्री 2025
1940जोराई बथारी में जन्म
4ऑल इंडिया रेडियो केंद्रों पर प्रस्तुति
2025पद्म श्री

दिमासा गीत के वरिष्ठ संरक्षक

जयनाचरण बथारी असम के दीमा हसाओ की दिमासा लोक-संगीत परंपरा के वरिष्ठ संरक्षक हैं। आधिकारिक प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 1 जुलाई 1940 को जोराई बथारी गाँव में हुआ। वे सरकारी सेवा में रहे, लेकिन इन सब वर्षों में दिमासा गीत, ढोल और बाँसुरी का धागा साथ-साथ चलता रहा।

रेडियो पर और मंच पर

उन्होंने ख्राम ढोल और मुरी बाँसुरी जैसे पारंपरिक वाद्यों के साथ दिमासा लोकगीत गाए, और सिलचर, हाफ़लोंग, डिब्रूगढ़ और शिलॉन्ग सहित ऑल इंडिया रेडियो केंद्रों पर प्रस्तुति दी। असम, पूर्वोत्तर और दिल्ली के मंचों ने इस कम जानी-पहचानी परंपरा को बड़े श्रोताओं तक पहुँचाया।

संगीत और समुदाय

उनकी सांस्कृतिक भूमिका सामुदायिक जीवन से भी जुड़ी रही। वे सहायक खुनांग, खुनांग (गाँव बूढ़ा), मौज़ादार और समुदाय के पुजारी रहे, और दिमासा शीर्ष संस्था जादिखे नाइशो होशोम से जुड़े रहे। इसलिए उनकी कहानी सिर्फ़ एक कलाकार की नहीं, सामुदायिक स्मृति के संरक्षक की है, जिसने एक ही जीवन में संगीत और सामाजिक संस्थाओं को जोड़ा।

यह अहम है कि अल्पसंख्यक और जनजातीय संगीत को प्रसारण के अभिलेखों में जगह मिले। और सम्मान देर से आए, तब भी जो बचाया गया उसका मूल्य कम नहीं होता।

स्रोत