लॉग इन
EN हिंदी
जॉर्डन लेप्चा
← सभी नायक
कला और संस्कृति · सिक्किम

वह टोपी जिसे बुनने में हफ़्ते लगते हैं

लेप्चा सुमोक थ्याकतुक को न जल्दी में बनाया जा सकता है, न बड़ी मात्रा में। जॉर्डन लेप्चा ने पच्चीस साल इन्हें हाथ से बनाने और युवाओं को यही सिखाने में लगाए हैं।

जॉर्डन लेप्चाJordan Lepcha
WhatsApp X Facebook

9 मई 2024 को पद्म श्री समारोह में जॉर्डन लेप्चा। फ़ोटो: राष्ट्रपति सचिवालय (GODL-India), विकिमीडिया कॉमन्स

यह कहानी सुनें0:00 / 1:46
AI आवाज़ में सुनाई गई
निवास
लोअर लिंगडोंग, मंगन ज़िला, सिक्किम
कला
लेप्चा बाँस की टोपी, सुमोक (सुमक) थ्याकतुक
अनुभव
लगभग 25 वर्ष
सम्मान
पद्म श्री 2024
~25वर्षों का अभ्यास
60 दिनका उन्नत प्रशिक्षण, 2025 में
20प्रतिभागियों ने पूरा किया

टोपी से कहीं ज़्यादा

जॉर्डन लेप्चा उन कारीगरों में हैं जो सिक्किम की लेप्चा बाँस कला को ज़िंदा रखे हुए हैं, ख़ासकर एक विशेष औपचारिक टोपी, सुमोक या सुमक थ्याकतुक। यह टोपी सिर्फ़ पहनने की चीज़ नहीं है। यह लेप्चा पहचान, राजसी समारोहों, पारिवारिक रिश्तों और समुदाय की कहानियों से जुड़ी है।

हफ़्तों की हाथ की मेहनत

क्षेत्रीय और PTI परिचयों के अनुसार जॉर्डन ने किशोर उम्र में इस कला का प्रशिक्षण शुरू किया और 2000 के दशक की शुरुआत में इसे पेशे के रूप में अपनाया। टोपी पूरी तरह स्थानीय प्राकृतिक सामग्री से बनती है, और रिपोर्टों के अनुसार एक टोपी बनाने में कई हफ़्ते, लगभग डेढ़ महीना, लग सकता है। यह हुनर इतना ख़ास है कि बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव नहीं, और यही इस विरासत को नाज़ुक बनाता है।

अगले बुनकरों को सिखाना

उनका सबसे बड़ा योगदान सिर्फ़ टोपियाँ बनाना नहीं, शिष्यों को सिखाना है। सार्वजनिक परिचयों के अनुसार उन्होंने 150 से ज़्यादा युवाओं को सिखाया है, जिनमें से कई ने बाँस पर आधारित रोज़गार शुरू किया। 2025 में वे MSME-RAMP कार्यक्रम के तहत सिक्किम सरकार के 60 दिन के उन्नत लेप्चा टोपी-निर्माण पाठ्यक्रम में मास्टर ट्रेनर रहे, जिसे 20 प्रतिभागियों ने पूरा किया। 2024 के पद्म श्री ने इस कला को राष्ट्रीय पहचान दी।

कोई पारंपरिक कला तभी बचेगी जब युवाओं को उसमें असली रोज़गार दिखे, और किसी उस्ताद कारीगर की असली विरासत उसके सिखाए लोगों में जीती है।

स्रोत