टोपी से कहीं ज़्यादा
जॉर्डन लेप्चा उन कारीगरों में हैं जो सिक्किम की लेप्चा बाँस कला को ज़िंदा रखे हुए हैं, ख़ासकर एक विशेष औपचारिक टोपी, सुमोक या सुमक थ्याकतुक। यह टोपी सिर्फ़ पहनने की चीज़ नहीं है। यह लेप्चा पहचान, राजसी समारोहों, पारिवारिक रिश्तों और समुदाय की कहानियों से जुड़ी है।
हफ़्तों की हाथ की मेहनत
क्षेत्रीय और PTI परिचयों के अनुसार जॉर्डन ने किशोर उम्र में इस कला का प्रशिक्षण शुरू किया और 2000 के दशक की शुरुआत में इसे पेशे के रूप में अपनाया। टोपी पूरी तरह स्थानीय प्राकृतिक सामग्री से बनती है, और रिपोर्टों के अनुसार एक टोपी बनाने में कई हफ़्ते, लगभग डेढ़ महीना, लग सकता है। यह हुनर इतना ख़ास है कि बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव नहीं, और यही इस विरासत को नाज़ुक बनाता है।
अगले बुनकरों को सिखाना
उनका सबसे बड़ा योगदान सिर्फ़ टोपियाँ बनाना नहीं, शिष्यों को सिखाना है। सार्वजनिक परिचयों के अनुसार उन्होंने 150 से ज़्यादा युवाओं को सिखाया है, जिनमें से कई ने बाँस पर आधारित रोज़गार शुरू किया। 2025 में वे MSME-RAMP कार्यक्रम के तहत सिक्किम सरकार के 60 दिन के उन्नत लेप्चा टोपी-निर्माण पाठ्यक्रम में मास्टर ट्रेनर रहे, जिसे 20 प्रतिभागियों ने पूरा किया। 2024 के पद्म श्री ने इस कला को राष्ट्रीय पहचान दी।
कोई पारंपरिक कला तभी बचेगी जब युवाओं को उसमें असली रोज़गार दिखे, और किसी उस्ताद कारीगर की असली विरासत उसके सिखाए लोगों में जीती है।
स्रोत
- पद्म पुरस्कार 2024: विजेताओं की सूची
- द प्रिंट (PTI): सिक्किम के बाँस टोपी कारीगर को पद्म श्री
- सिक्किम सरकार: MSME-RAMP के तहत लेप्चा टोपी प्रशिक्षण
- विकिमीडिया कॉमन्स: पद्म श्री समारोह फ़ोटो
- origin1-padma.padmaawards.gov.in/Document/pdf/padmaaward/PadmaAwardees2024.pdf
- theprint.in/india/sikkims-bamboo-hat-maker-jordan-lepcha-to-receive-padma-shri-award/1940045/
- sikkim.gov.in/media/news-announcement/news-info?name=Lepcha+Hat-Making+Training+Concludes+Under+MSME+RAMP+Programme