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हेमचंद मांझी
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चिकित्सा · छत्तीसगढ़

नारायणपुर के वैद्यराज

हेमचंद मांझी की पढ़ाई लगभग शुरू होने से पहले ही छूट गई। बस्तर के जंगलों में उन्हें एक दूसरी तरह का ज्ञान मिला, और उन्होंने पचास साल उसे उन ग्रामीणों के साथ बाँटा जिनके पास जाने की और जगहें कम थीं।

हेमचंद मांझीHemchand Manjhi
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2024 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से पद्म श्री ग्रहण करते हेमचंद मांझी। फ़ोटो: सांगरी टाइम्स के माध्यम से

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जन्म
1 जनवरी 1953
ज़िला
नारायणपुर, छत्तीसगढ़
पहचान
'वैद्यराज', पारंपरिक वैद्य
सम्मान
पद्म श्री 2024
50+वर्षों से ग्रामीण समुदायों की सेवा
1953जन्म
2024पद्म श्री

जंगल, वनस्पति और स्वास्थ्य

हेमचंद मांझी की कहानी बस्तर अंचल के उस स्थानीय ज्ञान से जुड़ी है जहाँ जंगल, औषधीय वनस्पतियाँ और ग्रामीण स्वास्थ्य लंबे समय से एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं। भारत सरकार की पद्म प्रशस्ति उन्हें नारायणपुर ज़िले के पारंपरिक वैद्य के रूप में दर्ज करती है, जिन्हें स्थानीय रूप से ‘वैद्यराज’ कहा जाता है।

प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 1 जनवरी 1953 को एक ग़रीब परिवार में हुआ। आर्थिक और पारिवारिक हालात के कारण पढ़ाई लगभग शुरू होते ही छूट गई; पिता की मृत्यु के बाद उन्हें पशु चराने और परिवार की ज़िम्मेदारियाँ उठानी पड़ीं। बाद में उन्होंने वन विभाग की नर्सरी में फ़ायर वॉचर के रूप में भी काम किया।

ज्ञान जो सेवा बन गया

प्रशस्ति उनके उपचार ज्ञान की शुरुआत को एक निजी, आध्यात्मिक अनुभव से जोड़ती है। यह उनकी जीवनकथा का हिस्सा है, लेकिन इससे किसी जड़ी-बूटी के उपचार की चिकित्सीय प्रभावशीलता सिद्ध नहीं होती।

समय के साथ वे आसपास के ग्रामीणों के लिए सुलभ पारंपरिक उपचार का जाना-पहचाना नाम बन गए। प्रशस्ति यह भी बताती है कि उनके काम से कुछ स्थानीय रोज़गार भी जुड़ा।

उनकी कहानी क्या सिखाती है

2024 में पद्म श्री ने उनकी लंबी सेवा और देसी ज्ञान को राष्ट्रीय पहचान दी। लगभग बिना औपचारिक शिक्षा के उन्होंने अपने परिवेश के ज्ञान को जीवन भर की सेवा में बदल दिया।

स्थानीय ज्ञान को दर्ज करना और उसका सम्मान करना ज़रूरी है। और स्वास्थ्य के मामलों में अनुभव और वैज्ञानिक प्रमाण को हमेशा अलग रखना चाहिए।

स्रोत