एक सदी लंबा जीवन
गुरु गोपीनाथ स्वैन सौ साल से ज़्यादा जिए, और उसका बड़ा हिस्सा ओडिशा की कृष्ण लीला संगीत परंपरा को सँभालने में लगाया। आधिकारिक पद्म प्रशस्ति के अनुसार उन्होंने लगभग दस साल की उम्र में परिवार और गुरु-परंपरा से कृष्ण लीला सीखनी शुरू की। उनका मुख्य भंडार 18वीं सदी के कवि दुखीश्याम दास की कृष्ण लीला पर आधारित था।
दुर्लभ रागों को ज़िंदा रखना
वे सिर्फ़ प्रस्तुति नहीं देते थे। वे ऐसे गुरु थे जो दुर्लभ ओडिसी राग, आलाप और पारंपरिक रचनाएँ याद रख सकते, गा सकते और सिखा सकते थे। उन्होंने पुरानी पांडुलिपियाँ और मौखिक सामग्री बचाई, और अखाड़ों के ज़रिए कई शिष्यों को प्रशिक्षण दिया। AIR बरहमपुर पर उनकी रिकॉर्डिंग और दूरदर्शन के एक साक्षात्कार ने इस परंपरा को अभिलेखों में भी जगह दी।
लंबे सफ़र के अंत में सम्मान
ओडिशा संगीत नाटक अकादमी ने उन्हें सम्मानित किया, और 2024 में उन्हें पद्म श्री मिला। 2 अक्टूबर 2025 को 107 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ।
उनकी कहानी बताती है कि विरासत बचाना कभी-कभी संग्रहालय में वस्तुएँ रखने से ज़्यादा, प्रस्तुति के जीवित तरीक़े को किसी की स्मृति और आवाज़ में ज़िंदा रखना है, और ख़त्म होने से पहले उसे आगे सौंप देना है।
स्रोत
- पद्म पुरस्कार 2024: आधिकारिक प्रशस्ति
- PIB: पद्म पुरस्कार 2024 समारोह
- द न्यू इंडियन एक्सप्रेस: कृष्ण लीला गुरु गोपीनाथ स्वैन का निधन
- padmaawards.gov.in/Document/pdf/CitationsForTickets/2024/2024122.pdf
- pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2018528&lang=2®=48
- newindianexpress.com/states/odisha/2025/Oct/02/krishna-leela-guru-gopinath-swain-passes-away