बचपन में सीखी कला
ग़ुलाम नबी डार कश्मीर की अखरोट की लकड़ी पर नक्काशी की परंपरा के उस्ताद कारीगर हैं। आधिकारिक पद्म प्रशस्ति के अनुसार उन्होंने लगभग दस साल की उम्र में यह कला सीखनी शुरू की, और पारंपरिक नमूनों में अपनी बारीक नज़र और प्रकृति से प्रेरित डिज़ाइन की भाषा जोड़ी। कठिन दौर से गुज़रते हुए वे सिर्फ़ कारीगर नहीं, एक लुप्त होती कला के संरक्षक बने।
प्रकृति से निकले डिज़ाइन
अखरोट की लकड़ी पर नक्काशी कश्मीर की सबसे ख़ास सजावटी कलाओं में है। इसके लिए वर्षों का हाथ का हुनर, नमूनों की याद और लकड़ी के स्वभाव की समझ चाहिए। डार ने सिर्फ़ तय नमूने दोहराने के बजाय पेड़-पौधों, जीवों और प्राकृतिक आकारों से प्रेरित डिज़ाइन बनाए। उनके काम को 1984 में राज्य पुरस्कार और 1995–96 में राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
हुनर आगे सौंपना
उनकी कला विदेश तक भी गई: प्रशस्ति में बग़दाद, जर्मनी और लिख्टेंस्टाइन, इंडोनेशिया और थाईलैंड का उल्लेख है। उन्होंने युवा कारीगरों को सिखाया ताकि यह हुनर आगे चलता रहे। 2024 का पद्म श्री उनका सम्मान है, और कश्मीर के धीमे, हाथ से बने ज्ञान का भी।
परंपरा और नए विचार दुश्मन नहीं हैं; नई डिज़ाइन भाषा किसी कला को ज़िंदा रख सकती है। और किसी हुनर को बचाने का असली पैमाना उसे अगली पीढ़ी को सिखाना है।
स्रोत
- पद्म पुरस्कार 2024: आधिकारिक प्रशस्ति
- इंडिया टुडे: कश्मीर के कारीगर को पद्म सम्मान
- द कश्मीर इमेजेज़: ग़ुलाम नबी डार को पद्म श्री
- padmaawards.gov.in/Document/pdf/CitationsForTickets/2024/202447.pdf
- indiatoday.in/india/story/ghulam-nabi-dar-kashmir-man-honoured-with-padma-recognition-2494057-2024-01-26
- thekashmirimages.com/2024/01/27/craft-safari-of-hh-deptt-comes-full-circle-with-padma-shri-honour-to-ghulam-nabi-dar/