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गफ़रुद्दीन मेवाती जोगी
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कला और संस्कृति · राजस्थान

हज़ारों दोहे, एक तार

गफ़रुद्दीन मेवाती जोगी महाभारत को अपनी स्मृति में रखते हैं। बगल में भपंग दबाए वे इसे वैसे ही गाते हैं जैसे उनके पिता ने सिखाया था, दोहा-दर-दोहा।

गफ़रुद्दीन मेवाती जोगीGafruddin Mewati Jogi
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गफ़रुद्दीन मेवाती जोगी। फ़ोटो: NDTV राजस्थान

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AI आवाज़ में सुनाई गई
क्षेत्र
मेवात, राजस्थान
वाद्य
भपंग
परंपरा
मेवाती जोगी मौखिक महाकाव्य, पिता बुध सिंह जोगी से सीखे
सम्मान
संगीत नाटक अकादमी सम्मान; पद्म श्री 2026
2,500+दोहे 'पांडुन का कड़ा' के (SNA-आधारित रिपोर्टें)
2026पद्म श्री

एक परंपरा जिसमें गीत ही स्मृति है

गफ़रुद्दीन मेवाती जोगी उस मौखिक लोक परंपरा के प्रतिनिधि हैं जिसमें कहानी, आस्था, संगीत और समुदाय की स्मृति साथ-साथ चलते हैं। राजस्थान के मेवात क्षेत्र से आने वाले गफ़रुद्दीन ने भपंग, एक तार वाला लोक वाद्य जिसे अक्सर ‘बोलने वाला ढोल’ कहा जाता है, अपने पिता बुध सिंह जोगी से सीखा। क्षेत्रीय परिचयों के अनुसार उन्होंने बहुत कम उम्र में प्रस्तुति देना शुरू कर दिया था।

महाभारत के 2,500 दोहे

उनकी ख़ूबी सिर्फ़ वाद्य बजाना नहीं, बल्कि विशाल मौखिक भंडार को याद रखना है। संगीत नाटक अकादमी की प्रशस्ति के आधार पर द इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा कि उन्हें महाभारत की मेवाती मौखिक प्रस्तुति ‘पांडुन का कड़ा’ के 2,500 से ज़्यादा दोहे याद हैं और वे इन्हें गाते हैं। उनके भंडार में शिवजी का ब्यावला, लोक रामायण और मेवात के समुदायों की साझी दूसरी भक्ति कथाएँ भी हैं।

साझी विरासत

उन्होंने मंदिर और मस्जिद, दोनों जगह प्रस्तुतियाँ दी हैं, जो मेवाती जोगी परंपरा की साझी संस्कृति को दिखाता है। दशकों की प्रस्तुतियाँ उन्हें विदेश तक भी ले गईं। 2026 का पद्म श्री उनका निजी सम्मान कम, और उस लुप्त होती परंपरा की राष्ट्रीय पहचान ज़्यादा है जिसे वे ज़िंदा रखे हुए हैं।

विरासत तभी बचती है जब उसे गाया और आगे सौंपा जाए। लोक परंपरा कोई कमतर कला नहीं है: वह इतिहास और समुदाय की स्मृति का संग्रह हो सकती है।

स्रोत