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दुखू माझी
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समाज सेवा · पश्चिम बंगाल

पुरुलिया के गाछ दादू

दुखू माझी के पास न कोई परियोजना थी, न बजट, न संस्था। उनके पास एक साइकिल थी, पानी के दो डिब्बे थे, और अपने लगाए पौधों के पास रोज़-रोज़ लौटने की आदत थी।

दुखू माझीDukhu Majhi
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दुखू माझी। फ़ोटो: हिंदुस्तान टाइम्स के माध्यम से

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AI आवाज़ में सुनाई गई
जन्म
1 जनवरी 1945
निवास
घोराबांधा, सिंदरी, पुरुलिया, पश्चिम बंगाल
पहचान
'गाछ दादू', पेड़ वाले दादा
सम्मान
पद्म श्री 2024
5,000+पौधे (न्यू इंडिया समाचार)
1945जन्म
2024पद्म श्री

पेड़ वाले दादा

पुरुलिया में दुखू माझी ‘गाछ दादू’ यानी पेड़ वाले दादा के नाम से जाने जाते हैं। उनकी आधिकारिक पद्म प्रशस्ति उन्हें ऐसे पर्यावरण प्रेमी के रूप में बताती है जिन्होंने पश्चिम बंगाल के इस गर्म, कम बारिश वाले इलाक़े में दशकों तक पेड़ लगाए और पाले। उनका जन्म 1 जनवरी 1945 को हुआ और औपचारिक पढ़ाई बहुत कम हुई।

एक साइकिल, दो डिब्बे, एक फावड़ा

उनका रोज़ का तरीक़ा बेहद सादा है। वे साइकिल पर पानी के डिब्बे, बोरियाँ, फावड़ा, जली लकड़ी और पौधे लेकर निकलते हैं। वे सड़कों के किनारे, गाँव के हाटों, बस अड्डों, श्मशानों, मंदिरों, स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों में पौधे लगाते हैं, फिर उन्हें पानी देते और बचाते हैं ताकि वे जी सकें। प्रशस्ति एक अनोखी आदत भी दर्ज करती है: वे श्मशान से मिले फेंके हुए कपड़े से नन्हे पौधों को ढकते हैं, ताकि राहगीर या जानवर उन्हें नुक़सान न पहुँचाएँ।

सालों और पेड़ों की गिनती

सरकारी प्रकाशन और स्वतंत्र पत्रकारिता, दोनों उनकी लंबी लगन को कहानी के केंद्र में रखते हैं। स्रोत इसे तीन से पाँच दशकों तक का काम बताते हैं; न्यू इंडिया समाचार इसे पाँच दशक की प्रतिबद्धता कहता है और बरगद, आम और जामुन के 5,000 से ज़्यादा पौधों का आँकड़ा देता है।

पौधा लगाने के बाद का काम

उनकी कहानी की ताक़त पैमाने से ज़्यादा उनके तरीक़े में है: लगभग बिना संसाधनों के लगातार पौधे लगाना और उनकी देखभाल करना। पौधारोपण अभियान अक्सर पौधा ज़मीन में लगते ही रुक जाते हैं। माझी का ध्यान उसे बड़ा होने तक पालने पर रहा। पेड़ लगाने का असली काम पौधा लगाने के बाद शुरू होता है।

स्रोत