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दासरी कोंडप्पा
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कला और संस्कृति · तेलंगाना

बुर्रवीणा के आख़िरी तार

जब किसी वाद्य को बजाना कुछ ही लोग जानते हों, तो उनमें से हर एक संगीतकार भी होता है और जीवित संग्रह भी। दासरी कोंडप्पा पचास साल से ज़्यादा समय से बुर्रवीणा को साथ लिए चल रहे हैं।

दासरी कोंडप्पाDasari Kondappa
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अपनी बुर्रवीणा के साथ दासरी कोंडप्पा। फ़ोटो: द न्यूज़ मिनट के माध्यम से

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AI आवाज़ में सुनाई गई
जन्म
1 जनवरी 1960
स्थान
दामरगिद्दा मंडल, नारायणपेट, तेलंगाना
वाद्य
बुर्रवीणा, बाँस, लौकी और धातु से बनी
सम्मान
पद्म श्री 2024 (कला)
50+वर्षों से कला को ज़िंदा रखा
2भाषाएँ: तेलुगु और कन्नड़
2024पद्म श्री

एक वाद्य और उसकी पूरी दुनिया

दासरी कोंडप्पा तेलंगाना की बुर्रवीणा के उन दुर्लभ वादकों में हैं जिनके साथ एक पूरी संगीत दुनिया जुड़ी है। बुर्रवीणा बाँस, लौकी के खोल और धातु से बना एक देसी तार-वाद्य है। उनकी पद्म प्रशस्ति उन्हें ‘तेलंगाना के आख़िरी बचे बुर्रवीणा वादकों में से एक’ बताती है और 50 से ज़्यादा वर्षों तक इस कला को ज़िंदा रखने का श्रेय देती है।

भाई से सीखना

उनका जन्म 1 जनवरी 1960 को नारायणपेट ज़िले के दामरगिद्दा मंडल में हुआ। अपने परिवार की तरह उन्होंने घुमंतू कलाकार का जीवन जिया, और बुर्रवीणा बजाकर गीतों में कहानियाँ सुनाकर रोज़ी कमाई। उनके भंडार में पुराण और इतिहास से लेकर पारिवारिक जीवन और आज के सामाजिक मुद्दे तक शामिल हैं।

प्रशस्ति का एक विवरण ख़ास है: उन्होंने रामायण और महाभारत के प्रसंग अपने दृष्टिहीन भाई से सीखे। वे तत्वालु, आस्था और समाज पर नैतिक गीत, और दार्शनिक रचनाएँ तेलुगु और कन्नड़ दोनों में गाते हैं।

एक बंद दायरे को खोलना

बुर्रवीणा की परंपरा लंबे समय तक अपने समुदाय के भीतर ही रही, इसीलिए नए सीखने वालों का दायरा बहुत छोटा रहा। इसे बड़े श्रोताओं तक ले जाकर कोंडप्पा ने उस दायरे को खोलने की कोशिश की है।

उनका पद्म श्री सिर्फ़ मंच की प्रस्तुति के लिए नहीं, एक लुप्त होती ग्रामीण कला को जीवित स्मृति में बनाए रखने के लिए है। मौखिक ज्ञान किसी भी लिखित संग्रह जितना अहम हो सकता है, और किसी वाद्य को बचाने के लिए सीखने वाले और सुनने वाले, दोनों बढ़ाने पड़ते हैं।

स्रोत