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चामी मुर्मू
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समाज सेवा · झारखंड

दस महिलाएँ और जंगल का आंदोलन

चामी मुर्मू ने दस महिलाओं और कुछ पौधों से शुरुआत की। तीन दशक बाद उनका नेटवर्क सैकड़ों गाँवों में फैला है, और जंगल की सेहत को उसकी रक्षा करने वाली महिलाओं की आमदनी से जोड़ता है।

चामी मुर्मूChami Murmu
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राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद से नारी शक्ति पुरस्कार ग्रहण करती चामी मुर्मू। फ़ोटो: भारत सरकार, विकिमीडिया कॉमन्स

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AI आवाज़ में सुनाई गई
जन्म
6 नवंबर 1971, भुरसा गाँव
ज़िला
सरायकेला-खरसावाँ, झारखंड
काम
पौधारोपण, जल संरक्षण, महिला स्वयं सहायता समूह
सम्मान
नारी शक्ति पुरस्कार; पद्म श्री 2024
500+गाँवों तक पहुँच
2,800स्वयं सहायता समूह
~30,000महिलाओं की भागीदारी

दस लोगों की छोटी टीम

चामी मुर्मू ने झारखंड के सरायकेला क्षेत्र में पर्यावरण और महिलाओं की रोज़ी-रोटी को एक साथ जोड़ा। आधिकारिक पद्म प्रशस्ति के अनुसार उनका जन्म 6 नवंबर 1971 को भुरसा गाँव के एक ग़रीब परिवार में हुआ। लगभग तीन दशक पहले उन्होंने सिर्फ़ दस महिलाओं की छोटी टीम के साथ पौधारोपण और समुदाय को संगठित करना शुरू किया।

500 गाँवों का नेटवर्क

समय के साथ उनका नेटवर्क 500 से ज़्यादा गाँवों तक फैल गया। पौधारोपण के साथ इस काम में वाटरशेड, डायवर्ज़न नहरें और वर्षा-जल संचयन की संरचनाएँ भी शामिल रहीं।

उन्होंने पर्यावरण के काम को महिलाओं की आमदनी से भी जोड़ा। प्रशस्ति 2,800 स्वयं सहायता समूहों और लगभग 30,000 महिलाओं की भागीदारी दर्ज करती है, बकरी पालन, सुअर और मुर्गी पालन, खेती और छोटे ऋणों के ज़रिए। उन्होंने ग़रीब आदिवासी लड़कियों की पढ़ाई में भी मदद की है।

पेड़ों की ईमानदार गिनती

उनके काम से जुड़े पेड़ों के आँकड़े अलग-अलग वर्षों के हैं, और उन्हें मिलाकर एक सटीक कुल संख्या नहीं बनानी चाहिए। पद्म प्रशस्ति पिछले दशक में 20 लाख से ज़्यादा पेड़ बताती है; 2020 का PIB परिचय 25 लाख बताता था; बाद की रिपोर्टें 28 लाख बताती हैं।

उनकी कहानी बताती है कि पर्यावरण और रोज़ी-रोटी साथ-साथ चलते हैं, और महिलाओं के नेतृत्व वाली स्थानीय संस्थाएँ बहुत बड़े पैमाने तक पहुँच सकती हैं।

स्रोत