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भगबत पधान
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कला और संस्कृति · ओडिशा

भगा मास्टरे और उनके 600 नर्तक

भगबत पधान के पास पक्की सरकारी नौकरी थी। उन्होंने उसे ओडिशा के अपने इलाक़े की एक कम जानी-पहचानी नृत्य परंपरा के लिए छोड़ दिया, और आधी सदी यह सुनिश्चित करने में लगा दी कि वह परंपरा उनके बाद भी ज़िंदा रहे।

भगबत पधानBhagabat Padhan
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भगबत पधान। फ़ोटो: ओडिशा न्यूज़ टाइम्स के माध्यम से

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AI आवाज़ में सुनाई गई
जन्म
24 जून 1938
स्थान
कुंभारी, बरगढ़ ज़िला, ओडिशा
परंपरा
शब्द नृत्य, पौराणिक कथाओं पर आधारित नृत्य
सम्मान
पद्म श्री 2024 (कला)
600+कलाकार तैयार किए (पद्म प्रशस्ति)
1974शब्द नृत्य गुरु बने
2024पद्म श्री

पक्की नौकरी छोड़ना

भगबत पधान ओडिशा के शब्द नृत्य के प्रमुख गुरुओं में गिने जाते हैं, जिसे उनकी पद्म प्रशस्ति पौराणिक कथाओं पर आधारित एक प्राचीन नृत्य शैली बताती है। उनका जीवन एक असामान्य फ़ैसले से शुरू होता है। सातवीं कक्षा के बाद उन्हें शिक्षा विभाग में शिक्षक की सरकारी नौकरी मिली, लेकिन कला की ओर खिंचाव इतना गहरा था कि उन्होंने नौकरी छोड़कर कुंभारी गाँव की ब्रजेश्वरी नृत्य कला संसद से कलाकार के रूप में जुड़ना चुना।

पचास साल का सिखाना

1974 में वे ‘शब्द नृत्य गुरु’ बने। अगली आधी सदी तक उन्होंने इस परंपरा को सिर्फ़ मंच पर नहीं निभाया, उसे सिखाया और आगे सौंपा। प्रशस्ति कहती है कि उन्होंने 600 से ज़्यादा कलाकार तैयार किए और पूरे इलाक़े में ‘भगा मास्टरे’ के नाम से पहचाने गए। उनके शिष्य ज़िले के बाहर भी फैले, जिससे इस शैली का बचना किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहा।

एक परंपरा जिसे देखने दुनिया आई

शब्द नृत्य का पौराणिक और अनुष्ठानिक स्वरूप इसे मुख्यधारा के मंचीय नृत्य से अलग करता है। शोधकर्ता, ओडिसी नर्तक, विद्वान और विदेशी आगंतुक कुंभारी संस्था आए, जिनमें इटली, जर्मनी, जापान, श्रीलंका, थाईलैंड और अमेरिका के लोग शामिल थे, और इससे ओडिशा के बाहर भी इस शैली की पहचान बढ़ी।

असली कहानी पुरस्कार से पहले के दशकों में है। बिना पैसे और बिना मुख्यधारा की शोहरत के उन्होंने एक दुर्लभ परंपरा को जीवित अभ्यास बनाए रखा। किसी गुरु का असर उसकी अपनी प्रस्तुतियों से नहीं, उसके शिष्यों से कई गुना होता है।

स्रोत